
सागर से मिलकर
Sagar Se Milkar
Bhawani Prasad Mishra
12 verses · ~19 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
Loading the archive
MM · XXVI

Shanta
Sadharan Ka Anand
Bhawani Prasad Mishra8 verses · ~2 min
सागर से मिलकर जैसे नदी खारी हो जाती है तबीयत वैसे ही भारी हो जाती है मेरी सम्पन्नों से मिलकर
व्यक्ति से मिलने का अनुभव नहीं होता ऐसा नहीं लगता धारा से धारा जुड़ी है एक सुगंध दूसरी सुगंध की ओर मुड़ी है
तो कहना चाहिए सम्पन्न व्यक्ति व्यक्ति नहीं है वह सच्ची कोई अभिव्यक्ति नहीं है
कई बातों का जमाव है सही किसी भी अस्तित्व का अभाव है मैं उससे मिलकर अस्तित्वहीन हो जाता हूँ
दीनता मेरी बनावट का कोई तत्व नहीं है फिर भी धनाढ्य से मिलकर मैं दीन हो जाता हूँ
अरति जनसंसदि का मैंने इतना ही अर्थ लगाया है अपने जीवन के समूचे अनुभव को इस तथ्य में समाया है
कि साधारण जन ठीक जन है उससे मिलो जुलो उसे खोलो उसके सामने खुलो वह सूर्य है जल है
फूल है फल है नदी है धारा है सुगंध है स्वर है ध्वनि है छंद है साधारण का ही जीवन में आनंद है!
इति

Paired Painting
Indian Riverbank Landscape with Figures and Shrine
Open the viewer →
If this held you
Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Sadharan Ka Anand carries.