№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

Canvas
Indian Riverbank Landscape with Figures and Shrine

Shanta

साधारण का आनन्द

Sadharan Ka Anand

Bhawani Prasad Mishra
2 min read 8 versesसाधारणordinaryसम्पन्न

8 verses · ~2 min

सागर से मिलकर जैसे नदी खारी हो जाती है तबीयत वैसे ही भारी हो जाती है मेरी सम्पन्नों से मिलकर

व्यक्ति से मिलने का अनुभव नहीं होता ऐसा नहीं लगता धारा से धारा जुड़ी है एक सुगंध दूसरी सुगंध की ओर मुड़ी है

तो कहना चाहिए सम्पन्न व्यक्ति व्यक्ति नहीं है वह सच्ची कोई अभिव्यक्ति नहीं है

कई बातों का जमाव है सही किसी भी अस्तित्व का अभाव है मैं उससे मिलकर अस्तित्वहीन हो जाता हूँ

दीनता मेरी बनावट का कोई तत्व नहीं है फिर भी धनाढ्य से मिलकर मैं दीन हो जाता हूँ

अरति जनसंसदि का मैंने इतना ही अर्थ लगाया है अपने जीवन के समूचे अनुभव को इस तथ्य में समाया है

कि साधारण जन ठीक जन है उससे मिलो जुलो उसे खोलो उसके सामने खुलो वह सूर्य है जल है

फूल है फल है नदी है धारा है सुगंध है स्वर है ध्वनि है छंद है साधारण का ही जीवन में आनंद है!

इति

Bhawani Prasad Mishra

The Poet

भवानीप्रसाद मिश्र

Bhawani Prasad Mishra

Indian Riverbank Landscape with Figures and Shrine

Paired Painting

Indian Riverbank Landscape with Figures and Shrine

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Sadharan Ka Anand carries.