№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

Canvas
Landscape at Sunset

Shanta

मुझे अफ़सोस है

Mujhe Afsos Hai

Bhawani Prasad Mishra
2 min read 15 versesअफ़सोसregretशाम

15 verses · ~2 min

मुझे अफ़सोस है या कहिए मुझे वह है जिसे मैं अफ़सोस मानता रहा हूँ

क्योंकि ज़्यादातर लोगों को ऐसे में नहीं होता वह जिसे मैं अफ़सोस मानता रहा हूँ

मेरा मन आज शाम को शहर के बाहर जाकर और बैठकर किसी

निर्जन टीले पर देर तक शाम होना देखते रहने का था

कारण-वश और क्या कहूँ सभा में जाने की विवशता को मैं शाम को

शहर के बाहर नहीं जा पाया न चढ़ पाया

इसलिए किसी टीले पर देख नहीं सका होती हुई शाम

और इसके कारण जैसा लग रहा है मन को उसे मैं अब तक

अफ़सोस ही कहता रहा हूँ लोगों को एक तो ऐसी

इच्छा ही नहीं होती होती है तो उसके पूरा न होने पर

उन्हें कुछ लगता नहीं है या जो लगता है उसे वे अफ़सोस

नहीं कहते मैं आज विजन में किसी टीले पर चढकर

देर तक होती हुई शाम नहीं देख पाया जाना पड़ा एक सभा में

इसका मुझे अफ़सोस है या कहिए मुझे वह है

जिसे मैं अफ़सोस मानता रहा हूँ!

इति

Bhawani Prasad Mishra

The Poet

भवानीप्रसाद मिश्र

Bhawani Prasad Mishra

Landscape at Sunset

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Landscape at Sunset

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Mujhe Afsos Hai carries.