№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Sunset on the Backwaters

Shanta

निर्जनों में

Nirjanon Mein

Pratibha Saxena
2 min read 5 versesएकांतमौननाविक

5 verses · ~2 min

आज माँझी ले चलो उन निर्जनों में, किसी पग की चाप से आगे वनों में ले चलो उस तट बिना पहचानवाले, जहां कोई आ नहीं पाये, पता ले.

जिस जगह, संध्या-सुबह चुपचाप आयें, रात्रियाँ आ मौन ही फिर लौट जायें, जहाँ कोई प्रश्न उठ पाये न आगे, जिस जगह, बस मौन का ही राग जागे.

चलो अब कुछ काल वहीं व्यतीत कर लें यहँ से कुछ भी बताये-बिन निकल लें दूर इतनी यहाँ की किरणे न आयें, यहाँ की यादें वहाँ तक जा न पायें.

पार सबको कर, चलो ऐसी दिशा में, इन तटों से दूर हो, कुछ दिन बिताने ले चलो उस ओर कोई द्वीप होगा, वहाँ से आकाश बहुत समीप होगा.

चलो मेरे साथ, चाहे लौट आना, यहँ से बस कर चलो कोई बहाना. ले चलो उन दूरियों तक जहाँ कोई भी न जाये, या कि उन गहराइयों में जहाँ कोई डूब जाये!

इति

Pratibha Saxena

The Poet

प्रतिभा सक्सेना

Pratibha Saxena

Sunset on the Backwaters

Paired Painting

Sunset on the Backwaters

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Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Nirjanon Mein carries.