№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

Loading the archive

MM · XXVI

Canvas
Untitled Coastal Landscape with Boats

Shanta

आइये इक पहर यहीं बैठें

Aaiye Ik Pahar Yahin Baithen

Amitabh Tripathi ‘Amit’
2 min read 6 versesशामeveningफुटपाथ

6 verses · ~2 min

आइये इक पहर यहीं बैठें साथ सूरज के ढलें सुरमई अंधेरों में सुने बेचैन परिन्दों की चहक लौट कर आते हुये फिर उन्ही बसेरों में

आशियाँ सबको हसीं लगता है अपना, लेकिन बस मुकद्‌दर में सभी के मकाँ नहीं होता और हैरत है कि मस्रूफ़ियाते-दीगर में इस कमी का मुझे कोई गुमाँ नहीं होता

उम्र कटती ही चली जाती है इन दरख़्तों के तले, बेंच पे, फुटपाथों पर कितने ही पेट टिके हैं देखें दौड़ती पैर की जोड़ी पे और हाथों पर

रोज़ सूरज को जगाता हूँ सवेरे उठकर रात तारों के दिये ढूँढ कर जलाता हूँ वक़्ते-रुख़्सत की वो आँखें उभर सी आती हैं जाने कितने ही ख़यालों में डूब जाता हूँ

ज़िन्दगी छोटी है, तवील भी है मस‍अला भी है, इक दलील भी है छोड़िये ये फ़िज़ूल की बहसें आइये इक पहर यहीं बैठें

शब्दार्थ: मसरूफ़ियाते-दीगर = अन्य व्यस्तताओं में वक़्ते-रुख़्सत = विदा के समय तवील = लम्बी मस‍अला = समस्या दलील = युक्ति

इति

Amitabh Tripathi ‘Amit’

The Poet

अमिताभ त्रिपाठी 'अमित'

Amitabh Tripathi ‘Amit’

Untitled Coastal Landscape with Boats

Paired Painting

Untitled Coastal Landscape with Boats

Open the viewer →

If this held you

Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Aaiye Ik Pahar Yahin Baithen carries.