
विवशता
Vivashata
Sarveshwar Dayal Saxena
5 verses · ~10 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

2 verses · ~1 min
कहो, तुम रूपसि कौन? व्योम से उतर रही चुपचाप छिपी निज छाया-छबि में आप, सुनहला फैला केश-कलाप,-- मधुर, मंथर, मृदु, मौन! मूँद अधरों में मधुपालाप, पलक में निमिष, पदों में चाप, भाव-संकुल, बंकिम, भ्रू-चाप, मौन, केवल तुम मौन! ग्रीव तिर्यक, चम्पक-द्युति गात, नयन मुकुलित, नत मुख-जलजात, देह छबि-छाया में दिन-रात, कहाँ रहती तुम कौन? अनिल पुलकित स्वर्णांचल लोल, मधुर नूपुर-ध्वनि खग-कुल-रोल, सीप-से जलदों के पर खोल, उड़ रही नभ में मौन! लाज से अरुण-अरुण सुकपोल, मदिर अधरों की सुरा अमोल,-- बने पावस-घन स्वर्ण-हिंदोल, कहो, एकाकिनि, कौन? मधुर, मंथर तुम मौन?
रचनाकाल: सितम्बर’१९३०
इति

Paired Painting
Tilottama
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Sandhya carries.