№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

Canvas
Seated Lady

Shanta

एक स्त्री घर से निकलते हुए भी नहीं निकलती

Ek Stri Ghar Se Nikalate Hue Bhi Nahi Nikalti

Shriprakash Shukla
2 min read 8 versesस्त्रीwomanघर

8 verses · ~2 min

एक स्त्री घर से निकलते हुए भी नहीं निकलती वह जब भी घर से निकलती है अपने साथ घर की पूरी खतौनी लेकर निकलती है

अचानक उसे याद आता है गैस का जलना दरवाज़े का खुला रहना नल का टपकना और दूध का दहकना

एक-एक कर वह पूछती है प्रेस तो बंद कर दिया था न! आँगन का दरवाज़ा तो लगा दिया था न! किचेन का सीधा वाला नल बंद करना तो नहीं भूली!

अरे! हाँ! वो सब्ज़ी वह मँहगी हरी पत्तियों वाली सब्ज़ी जो अभी कल ही तो लाई थी सटटी से प्लास्टिक से निकाल दिया था न!

हाँ, हाँ अरे सब तो ठीक है आपको ध्यान है आलमारी लाक करना तो नहीं भूली अभी कल की ही तो बात है महीनों को बचाए पैसे से नाक की कील ख़रीदी थी ।

इस तरह वह बार-बार याद करती और परेशान होती है कि दूध वाले को मना करना भूल गई कि बरतन वाली से कहना भूल गई कि उसे कल नहीं आना था कि पड़ोसिन को बता ही देना था कि कभी कभी मेरे घर को भी झाँक लिया करतीं ।

इस तरह एक स्त्री निकलती है घर से जैसे निकलना ही उसका होना है घर में ।

(25.09.2011)

इति

Shriprakash Shukla

The Poet

श्रीप्रकाश शुक्ल

Shriprakash Shukla

Seated Lady

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Seated Lady

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