
यात्री
Yatri
Pratibha Saxena
8 verses · ~36 lines · 2 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

4 verses · ~1 min
पुकार आ रही है! आसार बन रहे हैं एक नई यात्रा के! आहट सुन कसक उठी भीतर से; हर यात्रा की पूर्व संध्या होता है ऐसा! सीमित आत्म से निकल विराट् में प्रवेश करने का द्वार - यात्रा!
तैयार हो लूँ! जहाँ ,जिस तरह रही , घेरे से बाहर निकल आऊँ सारा ताम-झाम छोड़!
बिदा ,प्रिय स्मृतियों ,आशाओं-इच्छाओं ,संबंधों , स्वीकार लो प्रणाम मेरा , कि आगे निकल सकूँ, निरी एकाकी ,निरुद्विग्न और निरपेक्ष!
कि नये दृष्य ,नये अनुभव, मुक्त चेतना में समा सकें , कि एकदम अनाम अनुभूतियाँ अजाने संवेदन ग्रहण करने को मन के स्तर खुल जायें! रह जाऊँ एकदम खाली स्लेट, कि होनेवाले अंकन सुस्पष्ट रहें!
इति

Paired Painting
Yudhisthira and His Dog, Ascending
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Yatra carries.