
अरण्य-मन
Aranya-Man
Pratibha Saxena
8 verses · ~36 lines · 2 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

7 verses · ~3 min
विद्या का दान चले , जहाँ खुले हाथ , कन्या तो और भी सरस्वती की जात! और सिर पर पिता मास्टर का हाथ!
कंठ में वाणी भर , पहचान लिये अक्षर! शब्दों की रचना अर्थ जानने का क्रम! समझ गई शब्दों के रूप और भाव और फिर शब्दों से पार पढ़े मन! जाने कहाँ कहाँ के छोर , गहरी गहरी डूब तक! बन गया व्यसन! मास्टर की छोरी!
पराये लगे न कभी , लड़के ,हर बार नये , घर में आ रहते रहे! माता का मन उदार , भूख-प्यास जान रही , अक्सर ही स्वेटर भी! पढ़-लिख, तैयार चरण छूते, बिदा होते! किसी को भी नहीं खला , कभी कमी नहीं पड़ी! यों ही बड़ी होती रही मास्टर की छोरी!
एक दिन किसी ने कहा - उनके पास है क्या सिवा फ़ालतू की बातों के और इन किताबों के ? क्या अचार डालेगी , रीत-भाँत- दुनिया से कोरी ,-! मास्टर की छोरी!
बुरा लगा , हुई दुखन! जान गई अपना सच , साध लिया बिछला मन! दुनिया को समझ रही अपने से परख रही मास्टर की छोरी!
ब्याह गई! नये लोग नये ढंग! कमरोंवाला मकान, लोक- व्यवहार , सभी साज और सँवार! लेकिन किताबों बिन , सूनी सी लगतीं रही भरी अल्मारियाँ !
चाह उठे बार-बार , कभी एकान्त खोज, मन चाही किताब खोल पास धर लाई-चना देर तक पढ़ती रहे शान्त - चुपचाप! कहीं रुके अनायास , कुछ सोचती या गुनती रहे! मास्टर की छोरी! * पढ़ती सभी के मन , करने लगी जतन! ले अकेलापन कौन जाने वह चुभन! पाट नहीं पा रही . भीतर और बाहर के बीच बसी दूरी! मास्टर की छोरी!
इति

Paired Painting
Woman Holding a Fruit
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Master Ki Chori carries.