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Gypsies

KarunaIntermediate

कहाँ हूँ मैं

Kahan Hoon Main

Pratibha Saxena
3 min read 8 versesExistenceLonelinessCompassion

8 verses · ~3 min

कहाँ हूँ मैं! ढूँढ रही अपने को दुनिया की भीड़ में उत्सव -हुलास इधर , मस्त-मगन लोग संभव है यहीं- कहीं सामना हो जाय लोगों में घूम फिरी कहाँ -कहाँ ढूँढ फिरी! नहीं ,यहाँ कहीं नहीं! नहीं मिली! पता नहीं कहाँ हूँ ! खोजूँ कहाँ अपने को? हूं भी , कि हूँ ही नहीं ?

यहीं दूर खड़ा कौन? होकर असिक्त , निर्लिप्त सभी रंगों से! चुप्प ,एक दर्शक -सा! चेहरा बहुत जाना-पहचाना , ओह ,मैं ही तो! यहाँ हूँ , लेकिन उपस्थित नहीं! रुका जाता नहीं यहाँ, और कहीं निकल चलो!

उधऱ एक बालक अकेला असहाय, रोचा सिसकता लगातार , कंठ घरघराता ,बीमार , रोते-रोते थक गया सा! माँ उधर उत्सव के आंगन के नलके पर खुशियों के भाँडों में जमी -जली खुरचन को , जूठन की पर्तों में जकड़े हुये बर्तन को, रगड़-रगड़ धोयेगी , नहीं उठ पायेगी! कुछ न कर पायेगी!

बालक? अकेला पड़ा रुक-रुक रोयेगा! भूखा, अकेला ,बीमार , कैसे सोयेगा? कोई नहीं जो नेह दृष्टि डाल सहला दे! बहला दे, लगा ले आँचल से थपक कर सुला दे! आते-जाते अपने में मगन लोग, कोई देखता ही नहीं!

कोई है , , ख़ड़ा यहीं ,सिक्त दृष्टि ले दुलारता , नयनों में झाँकता निहारता! अपने ही आँसुओं को पल्ले से पोंछता खड़ा यहीं के यहीं! नैन अभी गीले हैं , आँसू बहे आये गाल मेरे हैं! फिर -फिर पोंछ रहे हाथ यही मेरे हैं! दृष्टि ने कहा था यही - ' कोख-जाया माँ ,उस जनम का मैं तुम्हारा हूँ! भूल गईं?' फेर नहीं पा रही निगाह कैसे छोड़ दूँ अकेला असहाय! लौट जाओ मेरे प्रतिरूप मेरे बिना कौन उसे देखेगा ? हीं ठीक हूँ मैं !

राग-रंग मुझसे दूर-दूर रह जायेंगे , परस नहीं पायेंगे, कोशिशे बेकार हर बार! पडे हुये कुण्ठित सुख -बोध सभी, मेरी गुज़र नहीं कहीं! डुबा सकी होती मन क्षण भर ही, काश ,कहीं!

मत कहो आने को! रोने की क्षीण ध्वनि , सुख की उल्लास भरी तानो को चीरती , वहाँ तक चली आयेगी! कानो से रह-रह टकरायेगी! मुझे यहीं रहना है! रोता अकेला उसे छोड़ कहाँ जाऊँगी! लौट यहीं आऊँगी!!

दूर , रंग- मंडप की हलचल से अलग-थलग , रहने दो कोशिशे, बेकार! यहीं ठीक हूँ मैं - निष्कासित हुई-सी, निस्संग!

इति

Pratibha Saxena

The Poet

प्रतिभा सक्सेना

Pratibha Saxena

Gypsies

Paired Painting

Gypsies

In this poignant composition, Raja Ravi Varma captures the transient lives of wanderers with a profound sense of dignity and human empathy. The painting portrays a nomadic family pausing in a structured, stone environment, highlighting the stark contrast between their humble, mobile existence and the stillness of the architecture. The mother, cradling her sleeping child, balances the burdens of survival with a gentle grace that transcends her meager circumstances. Through his mastery of light and shadow, Varma elevates the subjects from mere street figures to icons of resilience, inviting the viewer to contemplate the hidden stories and enduring spirits of those who move through the margins of society.

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