№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

Canvas
Woman with Fruit Plate

Karuna

अपना घर

Apana Ghar

Pratibha Saxena
2 min read 4 versesघरhomewomanhood

4 verses · ~2 min

कहाँ है मेरा घर? जाना चाहती हूँ , रहना चाहती हूँ अब वहीं! छोटी थी तो समझ में नहीं आता था , सुनती थी पराई अमानत हूँ, अपने घर जाकर जो मन आये करना! धीरे-धीरे समझ में आता गया कि यह घर मेरा नहीं । पर फिर यहाँ जन्म क्यों लिया?

बड़ी हुई - घर ढूँढा जाने लगा जहाँ भेज दी जाऊं , उऋण हो जायें ये लोग ,भार मुक्त! चुपचाप चली आई नये लोगों में! पर ये घर तो उनका था जो लोग यहीं रहते आये थे!

मैं नवागता , ढालती रही अपने को उनके हिसाब से! नाम उनका ,धाम उनका , सारी पहचान उनकी! बनाये रखने की जिम्मेदारी मेरी थी , निभाती रही! निबटाते -निबटाते चुक गई , अब भी रह रही हूँ पराये घरों में , सबके अपने ढंग!

ढाल रही हूँ फिर अपने को कितनी बार ,कितनी तरह! अंतर्मन बार-बार पुकारता है - 'चलो अपने घर चलो!' जनम-जनम से गुमनाम भटक रही हूं! कहाँ है मेरा घर!

इति

Pratibha Saxena

The Poet

प्रतिभा सक्सेना

Pratibha Saxena

Woman with Fruit Plate

Paired Painting

Woman with Fruit Plate

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Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Apana Ghar carries.