
अश्वत्थामा
Ashwatthama
Pratibha Saxena
2 verses · ~31 lines · 2 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

6 verses · ~2 min
वह प्रथम छंद, बह चला उमड़ कर अनायास सब तोड़ बंध, ऋषि के स्वर में वह लोक-जगत का आदि छंद!
जब तपोथली में जन-जीवन से उदासीन, करुणाकुल वाणी अनायास हो उठी मुखर क्रौंची की दारुण-व्यथा द्रवित आकुल कवि-मन की संवेदना अनादि-स्वरों में गई बिखर .
अंतर में कैसी पीर, अशान्ति और विचलन ऐसे ही विषम पलों में कोई सम्मोहन स्वर भरता मुखरित कर जाता अंतर -विषाद मूर्तित करुणा का निस्स्वर असह अरण्य रुदन,
तब देवावाहन - सूक्त स्तुतियाँ सब बिसार कवि संबोधित कर उठा,' अरे, ओ, रे निषाद..' स्वर प्राणि-मात्र की विकल वेदना के साक्षी शास्त्रीय विधानों रीति-नीति से विगत-राग.
जैसे गिरि वर से अनायास फूटे निर्झर उस आदि कथ्य से सिंचित हुआ जगत-कानन, कंपन भर गया पवन में जल में हो अधीर, तमसा के ओर-छोर, गिरि वन, तट के आश्रम!
खोया निजत्व उस विषम वेदना के पल में तब प्राणिमात्र से जुड़े झनझना हृदय- तार उस स्वर्णिम पल में, बंध तोड़ आवरण छोड़ ऊर्जित स्वर भर सरसी कविता की अमिय-धार!
इति

Paired Painting
Death of Jatayu
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Pratham Chhand carries.