
एक किरन भोर की
Ek Kiran Bhor Ki
Buddhinath Mishra
3 verses · ~8 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

5 verses · ~1 min
दिन को ही हो गई रात-सी, लगता कालजयी होगी कविता बोली- "मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी।"
गली-गली कूड़ा बटोरता, देखो बचपन बेचारा टूटे हुए ख्वाब लादे, फिरता यौवन का बनजारा कहीं बुढ़ापे की तनहाई, करती दई-दई होगी!
जलती हुई हवाएँ मार रही हैं चाँटे पर चाँटा लेट गया है खेतों ऊपर यह जलता-सा सन्नाटा फिर भी लगता है कहीं पर श्याम घटा उनई होगी!
सोया है दुर्गम भविष्य चट्टान सरीखा दूर तलक जाना है उस पार मगर आँखें रुक जाती हैं थक-थक खोजो यारो, सूने में भी कोई राह गई होगी!
टूटे तारों से हिलते हैं यहाँ-वहाँ रिश्ते-नाते शब्द ठहर जाते सहसा इक-दूजे में आते-जाते फिर भी जाने क्यों लगता- कल धरती छंदमयी होगी!
इति

Paired Painting
Gypsies
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Kal Phir Subah Nai Hogi carries.