№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

Canvas
Gypsies

Shanta

कल फिर सुबह नई होगी

Kal Phir Subah Nai Hogi

Ramdarash Mishra
1 min read 5 versesसुबहबचपनयौवन

5 verses · ~1 min

दिन को ही हो गई रात-सी, लगता कालजयी होगी कविता बोली- "मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी।"

गली-गली कूड़ा बटोरता, देखो बचपन बेचारा टूटे हुए ख्वाब लादे, फिरता यौवन का बनजारा कहीं बुढ़ापे की तनहाई, करती दई-दई होगी!

जलती हुई हवाएँ मार रही हैं चाँटे पर चाँटा लेट गया है खेतों ऊपर यह जलता-सा सन्नाटा फिर भी लगता है कहीं पर श्याम घटा उनई होगी!

सोया है दुर्गम भविष्य चट्टान सरीखा दूर तलक जाना है उस पार मगर आँखें रुक जाती हैं थक-थक खोजो यारो, सूने में भी कोई राह गई होगी!

टूटे तारों से हिलते हैं यहाँ-वहाँ रिश्ते-नाते शब्द ठहर जाते सहसा इक-दूजे में आते-जाते फिर भी जाने क्यों लगता- कल धरती छंदमयी होगी!

इति

Ramdarash Mishra

The Poet

रामदरश मिश्र

Ramdarash Mishra

Gypsies

Paired Painting

Gypsies

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Kal Phir Subah Nai Hogi carries.