№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Hanuman Bound in the Court of Ravana

Veera

गिरि पर चढ़ते, धीरे-धीर

Giri Par Chadhte, Dheere-Dheere

Makhanlal Chaturvedi
3 min read 15 versesपर्वतउषाशिखर

15 verses · ~3 min

सूझ! सलोनी, शारद-छौनी, यों न छका, धीरे-धीरे! फिसल न जाऊँ, छू भर पाऊँ, री, न थका, धीरे-धीरे!

कम्पित दीठों की कमल करों में ले ले, पलकों का प्यारा रंग जरा चढ़ने दे, मत चूम! नेत्र पर आ, मत जाय असाढ़, री चपल चितेरी! हरियाली छवि काढ़!

ठहर अरसिके, आ चल हँस के, कसक मिटा, धीरे-धीरे!

झट मूँद, सुनहाली धूल, बचा नयनों से मत भूल, डालियों के मीठे बयनों से, कर प्रकट विश्व-निधि रथ इठलाता, लाता यह कौन जगत के पलक खोलता आता?

तू भी यह ले, रवि के पहले, शिखर चढ़ा, धीरे-धीरे।

क्यों बाँध तोड़ती उषा, मौन के प्रण के? क्यों श्रम-सीकर बह चले, फूल के, तृण के? किसके भय से तोरण तस्र्-वृन्द लगाते? क्यों अरी अराजक कोकिल, स्वागत गाते?

तू मत देरी से, रण-भेरी से शिखर गुँजा, धीरे-धीरे।

फट पड़ा ब्रह्य! क्या छिपें? चलो माया में, पाषाणों पर पंखे झलती छाया में, बूढ़े शिखरों के बाल-तृणों में छिप के, झरनों की धुन पर गायें चुपके-चुपके

हाँ, उस छलिया की, साँवलिया की, टेर लगे, धीरे-धीरे।

तस्र्-लता सींखचे, शिला-खंड दीवार, गहरी सरिता है बन्द यहाँ का द्वार, बोले मयूर, जंजीर उठी झनकार, चीते की बोली, पहरे का `हुशियार'!

मैं आज कहाँ हूँ, जान रहा हूँ, बैठ यहाँ, धीरे-धीरे।

आपत का शासन, अमियों? अध-भूखे, चक्कर खाता हूँ सूझ और मैं सूखे, निर्द्वन्द्व, शिला पर भले रहूँ आनन्दी, हो गया क़िन्तु सम्राट शैल का बन्दी।

तू तस्र्-पुंजों, उलझी कुंजों से राह बता, धीरे-धीरे।

रह-रह डरता हूँ, मैं नौका पर चढ़ते, डगमग मुक्ति की धारा में, यों बढ़ते, यह कहाँ ले चली कौन निम्नगा धन्या! वृन्दावन-वासिनी है क्या यह रवि-कन्या?

यों मत भटकाये, होड़ लगाये, बहने दे, धीरे-धीरे और कंस के बन्दी से कुछ कहने दे, धीरे-धीरे!

इति

Makhanlal Chaturvedi

The Poet

माखनलाल चतुर्वेदी

Makhanlal Chaturvedi

Hanuman Bound in the Court of Ravana

Paired Painting

Hanuman Bound in the Court of Ravana

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Giri Par Chadhte, Dheere-Dheere carries.