
जब भी
Jab Bhi
Sarveshwar Dayal Saxena
13 verses · ~6 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

3 verses · ~1 min
धरती तल में उगी घास यों ही अनायास, पलती रही धरती के क्रोड़ में, मटीले आँचल में . हाथ-पाँव फैलाती आसपास . मौसमी फूल नहीं हूँ कि,यत्न से रोपी जाऊँ, पोसी जाऊँ!
हर तरह से, रोकना चाहा, . कि हट जाऊँ मैं, धरती माँ का आँचल पाट कर ईंटों से कि कहीं जगह न पाऊँ . पर कौन रोक पाया मुझे? जहाँ जगह मिली सँधों में जमें माटी कणों से फिर-फिर फूट आई.
सिर उठा चली आऊँगी, जहाँ तहाँ, यहाँ -वहाँ, आहत भले होऊँ हत नहीं होती, झेल कर आघात, जीना सीख लिया है, उपेक्षाओँ के बीच अदम्य हूँ मैं!
इति

Paired Painting
Portrait of Maharana Pratap
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Adamya carries.