
अधपके अमरूद की तरह पृथ्वी
Adhpake Amrood Ki Tarah Prithvi
Ashok Vajpeyi
6 verses · ~8 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Adbhuta
Parvat Pradesh Mein Pavas
Sumitranandan Pant7 verses · ~1 min
पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश, पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।
मेखलाकर पर्वत अपार अपने सहस्त्र दृग-सुमन फाड़, अवलोक रहा है बार-बार नीचे जल में निज महाकार,
-जिसके चरणों में पला ताल दर्पण सा फैला है विशाल!
गिरि का गौरव गाकर झर-झर मद में लनस-नस उत्तेजित कर मोती की लडि़यों सी सुन्दर झरते हैं झाग भरे निर्झर!
गिरिवर के उर से उठ-उठ कर उच्चाकांक्षायों से तरूवर है झॉंक रहे नीरव नभ पर अनिमेष, अटल, कुछ चिंता पर।
उड़ गया, अचानक लो, भूधर फड़का अपार वारिद के पर! रव-शेष रह गए हैं निर्झर! है टूट पड़ा भू पर अंबर!
धँस गए धरा में सभय शाल! उठ रहा धुऑं, जल गया ताल! -यों जलद-यान में विचर-विचर था इंद्र खेलता इंद्रजाल
इति

Paired Painting
Krishna Lifting the Mountain Govardhana with Shridama and Madhumangal
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Parvat Pradesh Mein Pavas carries.