Canvas
Bharat Mata

VeeraIntermediate

मातृभूमि

Matribhumi

Maithili Sharan Gupt
2 min read 7 versesPatriotismNature

7 verses · ~2 min

नीलांबर परिधान, हरित तट पर सुन्दर है। सूर्य-चन्द्र युग्म मुकुट, मेखला रत्नाकर है। नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल-तारे मंडन हैं। बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है। करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की। हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की।

जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुए हैं। घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं। परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाए। जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाए। हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में। हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?

पाकर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा। तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा? तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है। बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है। फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी। हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी।

निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है। शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है। षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है। हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है। शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है। हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है।

सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं। भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते हैं। औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली। खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली। जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं। हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं।

क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है। सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है। विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है। भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है। हे शरणदायिनी देवि, तू करती सबका त्राण है। हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है।

जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे। उससे, हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे। लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे। उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे। उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे। होकर भव-बन्धन-मुक्त हम, आत्मरूप बन जायेंगे।

इति

Maithili Sharan Gupt

The Poet

मैथिलीशरण गुप्त

Maithili Sharan Gupt

Bharat Mata

Paired Painting

Bharat Mata

Painted by the visionary master Abanindranath Tagore in 1905, Bharat Mata stands as a luminous pillar of the Bengal School of Art and a sacred visual manifesto of Indian nationalism. Conceived during the tumultuous partition of Bengal and the consequent Swadeshi movement, Tagore reimagined the motherland not merely as a geographical territory, but as a divine, nurturing ascetic deity. Adrobed in the simple saffron garments of renunciation, her four gentle arms tenderly hold symbols of sustenance, learning, clothing, and spiritual liberation, embodying the self sufficiency and cultural pride that the nation so deeply yearned for. Bathed in a serene, golden aura, she stands upon white lotus blossoms rising from tranquil waters, exuding a quiet grace that transcends political struggle and touches the realm of the eternal.

Open the viewer →