
साधो ये मुरदों का गांव
Sadho Ye Murdon Ka Gaon
Kabir
17 verses · ~10 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

22 verses · ~5 min
कबीर टुक टुक चोंगता, पल पल गयी बिहाय | जिन जंजाले पड़ि रहा, दियरा यमामा आय ||
ऐ जीव! तू क्या टुकुर टुकुर देखता है? पल पल बीताता जाता है, जीव जंजाल में ही पड़ रहा है, इतने में मौत ने आकर कूच का नगाड़ा बजा दिया |
जो उगै सो आथवै, फूले सो कुम्हिलाय | जो चुने सो ढ़हि पड़ै, जनमें सो मरि जाय ||
उगने वाला डूबता है, खिलने वाला सूखता है | बनायी हुई वस्तु बिगड़ती है, जन्मा हुआ प्राणी मरता है |
कबीर मन्दिर आपने, नित उठि करता आल | मरहट देखी डरपता, चौड़े दीया डाल ||
नित्ये उठकर जो आपने मन्दिर में आनंद करते थे, और श्मशान देखकर डरते थे, वे आज मैदान में उत्तर - दक्षिण करके डाल दिये गये |
कबीर गाफिल क्यों फिरै क्या सोता घनघोर | तेरे सिराने जम खड़ा, ज्यूँ अँधियारे चोर ||
ऐ मनुष्य! क्यों असावधानी में भटकते और मोर की घनघोर निद्रा में सोते हो? तेरे सिराहने मृत्यु उसी प्रकार खड़ी है जैसे अँधेरी रात में चोर |
आस - पास जोधा खड़े, सबै बजावै गाल | मंझ महल सेले चला, ऐसा परबल काल ||
आस - पास में शूरवीर खड़े सब डींगे मारते रह गये | बीच मन्दिर से पकड़कर ले चला, काल ऐसा प्रबल है |
बेटा जाये क्या हुआ, कहा बजावे थाल | आवन जावन होय रहा, ज्यों कीड़ी का नाल ||
तेरे पुत्र का जन्म हुआ है, तो क्या बहुत अच्छा हुआ है? और प्रसंता में तू क्या थाली बजा रहा है? ये तो चींटियों को पंक्ति के समान जीवों का आना जाना लगा है |
बालपन भोले गया, और जुवा महमंत | वृद्धपने आलस गयो, चला जरन्ते अन्त ||
बालपन तो भोलेपन में बीत गया, और जवानी मदमस्ती में बीत गयी | बुढ़ापा आलस्य में खो गया, अब अन्त में चिता पर जलने के लिये चला |
घाट जगाती धर्मराय, गुरुमुख ले पहिचान | छाप बिना गुरु नाम के, साकट रहा निदान ||
घाट की चुंगी लेने वाला धर्मराज (वासना) है, वह गुरुमुख को पहचान लेता है | गुरु - ज्ञानरूपी चिन्ह बिना, अन्त के साकट लोग यम के हाथ में पड़ गये |
सब जग डरपै काल सों, ब्रह्मा विष्णु महेश | सुर नर मुनि औ लोक सब, सात रसातल सेस ||
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सुर, नर, मुनि और सब लोक, साल रसातल तथा शेष तक जगत के सरे लोग काल के डरते हैं |
काल फिरै सिर ऊपरै, हाथों धरी कमान | कहैं कबीर घु ज्ञान को, छोड़ सकल अभिमान ||
हाथों में धनुष बांड लेकर काल तुम्हारे सिर ऊपर घूमता है, गुरु कबीर जी कहते है कि सम्पूर्ण अभिमान त्यागकर, स्वरुप ज्ञान ग्रहण करो |
जाय झरोखे सोवता, फूलन सेज बिछाय | सो अब कहँ दीसै नहीं, छिन में गये बिलाय ||
ऊँची अटारी की खिड़कियों पर फूलों की शैया बिछाकर जो सोते थे वे देखते देखते विनिष्ट हो गये | अब सपने में भी नहीं दिखते |
इति

Paired Painting
View from Ugneswur Ghat, Benares
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If this held you
Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Kaal Ki Mahima carries.