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Ibn-e-Insha
2 verses · ~10 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Karuna
Shaam-E-Gham Ki Sahar Nahin Hoti
Ibn-e-Insha11 verses · ~1 min
शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती या हमीं को ख़बर नहीं होती
हम ने सब दुख जहाँ के देखे हैं बेकली इस क़दर नहीं होती
नाला यूँ ना-रसा नहीं रहता आह यूँ बे-असर नहीं होती
चाँद है कहकशाँ है तारे हैं कोई शय नामा-बर नहीं होती
एक जाँ-सोज़ ओ ना-मुराद ख़लिश इस तरफ़ है उधर नहीं होती
दोस्तों इश्क़ है ख़ता लेकिन क्या ख़ता दरगुज़र नहीं होती
रात आ कर गुज़र भी जाती है इक हमारी सहर नहीं होती
बे-क़रारी सही नहीं जाती ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती
एक दिन देखने को आ जाते ये हवस उम्र भर नहीं होती
हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता हर किसी की नज़र नहीं होती
दिल पियाला नहीं गदाई का आशिक़ी दर-ब-दर नहीं होती
इति

Paired Painting
Urvashi
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