
फिर आई फस्ले गुल फिर जख़्मदह रह-रह के पकते हैं
Phir Aayi Fasle Gul Phira Zakhmadaha Raha-Raha Ke Pakate Hain
Bharatendu Harishchandra
8 verses · ~17 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Shringara
Ajab Joban Hai Gul Par Aamde Fasle Bahari Hai
Bharatendu Harishchandra8 verses · ~2 min
अजब जोबन है गुल पर आमदे फ़स्ले बहारी है । शिताब आ साकिया गुलरू[1] कि तेरी यादगारी है ।
रिहा करता है सैयादे सितमगर मौसिमे गुल में । असीराने[2] कफ़स[3] लो तुमसे अब रुख़सत हमारी है ।
किसी पहलू नहीं आराम आता तेरे आशिक को । दिले मुज़तर[4] तड़पता है निहायत बेक़रारी है ।
सफ़ाई देखते ही दिल फड़क जाता है बिस्मिल[5] का । अरे जल्लाद तेरे तेग़[6] की क्या आबदारी[7] है ।
दिला[8] अब तो फ़िराक़े[9] यार में यह हाल है अपना कि सर जानू पर है और ख़ून दह आँखों से जारी है ।
इलाही ख़ैर कीजो कुछ अभी से दिल धड़कता है । सुना है मंज़िले औवल[10] की पहली रात भारी है ।
'रसा' महवे[11] फ़साहत[12] दोस्त क्या दुश्मन भी हैं सारे । ज़माने में तेरे तर्ज़े सख़ुन की यादगारी है ।
शब्दार्थ:
इति

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Kadambari
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