
6 verses · ~2 min
मेरी त्वचा की पार्थिव दरारें तुम्हारी अनुपस्थिति का रेखांकन हैं प्रेम तुम्हारी नीति थी मुझ पर राज करना तुम्हारी इच्छा मैं तुम्हारी राजनीति से मारा गया
मेरे हृदय में हर पल मृत्यु का स्पंदन है बाँह के पास एक नस उसी लय पर फड़कती है जिस पर दिल धड़कता है
इतने बरसों में इतने शहरों में इतने मकानों में इतनी तरहों सेरहता आया मैं कि कई बार सुबह उठने पर यह अंदाज़ा नहीं होता कि बाईं ओर को बाथरूम पड़ता है या बाल्कनी
इस महासागर में जितनी भी बूँदें हैं वे मेरे जिए हुए पल हैं जितनी बूंदें छिपी हैं अनंत के मेघ और अमेघ में दिखने पर वे भी ठीक ऐसी ही दिखती हैं
मैं बलता रहा दीप की बाती की तरह जिसमें डूबा था वह तैल मुझे छलता रहा भरी दोपहर बीच सड़क जलाया तुमने मुझे मुझे कमतर जताने की तुम्हारी इस विनम्रता को चूमता हूं मैं
तुम आओ और मेरे पैरों में पहिया बन जाओ इस मंथरता से थक चुका हूँ मैं थकने के लिए अब मुझे गति चाहिए
इति

Paired Painting
Karna Lifting the Chariot Wheel
The artwork portrays Karna, the tragic hero of the Mahabharata and the first son of Kunti and Surya, caught in the devastating moment of the Kurukshetra war when his chariot wheel sinks into the earth. Abandoned by fortune and bound by a curse, Karna pauses to extract the heavy wheel, offering a vulnerable yet defiant target to his archrival Arjuna. This painting captures the immense physical strength and the deeper emotional turmoil of a noble warrior standing resolute against the relentless tide of fate.
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