№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Draupadi Humiliated

Karuna

उनका दर्द मेरी ज़ुबान

Unka Dard Meri Zuban

Divik Ramesh
5 min read 13 versesत्रासदीtragedyदर्द

13 verses · ~5 min

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी शायद वह आतंकवादी भी नहीं है जो भून डालता है महज भूनने के लिए जिसके पास है भी कोई समझ या दॄष्टि — संदेह ही बना रहता है ।

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी शायद यह है कि हमारे ही सामने, हमारे ही मुहल्लों में हमारी ही समझ की छतों के नीचे हमारे दर्दों को भी हमारा नहीं रहने दिया जाता । बस छीन लिया जाता है हमसे — न कोई क़ीमत, न कोई मुआवजा!

कैसी त्रासदी है न? होते ही उनका हमारा दर्द हमें ही पहचानने से इनकार कर देता है — ओपरा-ओपरा होकर आँखें चुराता है । बड़े घर के कुत्तों-सा लगता है घूमने बड़ी-बड़ी गाड़ियों में । कहाँ-कहाँ तक पहुँच नहीं हो जाती — क्या इमारतें और क्या बड़े-बड़े होटल । कुर्सी-मेज़ों पर खाने उड़ाता है । कोई कान तक नहीं देता था जिनकी और अब देखिए औकात उनकी — कितना बड़ा अभिनेता हो गया है — निकल-निकल भोंपुओं से कैसा रंग जमाता है । उसके दर्दीले ठुमकों पर पूरी दुनिया नागिन-सी झूमती है ।

हमारा दर्द जो हमें भिखारी तक बना देता था पहुँचते ही मंचों पर हमें दाता की मुद्रा में ला देता है । और कवच ओढ़े हमारे दर्दों के वे (जिनके नाम लेने तक में ख़तरा है हमें) हमारी त्रासदी के देवता बन बैठते हैं । और हम? हमें तो पता ही नहीं चलता कब क्या हो जाते हैं हम ।

हाँ, गाहे-बगाहे जाने क्यों लगता है लगने कि उनके भोंपू ही नहीं अन्दोलन भी लादे अपने कंधों पर उन्हें ही ढोते हैं । ढोते हैं जैसे ढोते रहे हैं अपनी मजबूरियाँ अपनी भूख और प्यास भी और डरों में लिपटा अपना गुस्सा भी ।

क्या नहीं है यह भी हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी?

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी तो यह भी है

कि ताक़त है हममें पर जीते हैं ताक़त की मुद्रा में । हममें युद्ध है पर जीते हैं युद्ध की मुद्रा में । हममें गुस्सा है पर जीते हैं गुस्से की मुद्रा में । हम फेंक सकते हैं उखाड़ कर पर जीते हैं उखाड़ फेंकने की मुद्रा में । हममें समझ है पर जीते हैं समझ की मुद्रा में ।

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी शायद यह भी है

कि हम महज बहस करते हैं और वे उलझाए रखते हैं हमें बहसों में जिन्हें वे आश्वासन कहते हैं हमारे मरने का इंतज़ार करते हैं और एक दिन हम सचमुच मर जाते हैं — यानी उनके धैर्य पर अपने अधैर्य को कुर्बान कर देते हैं जबकि इच्छा उन्हीं की होती है ऐसी, पर अदृश्य ।

वे महज मुद्रा में होते हैं बहस की, कहाँ समझ पाते हैं!

हार-गिर कर समझ पाते हैं तो बस इतना ही — क्या जाता है अपने बाप का जो होता है होते रहने दीजिए ।

तो फिर बनते रहिए बेवकूफ़ क्या जाता है अपने बाप का भी ।

इति

Divik Ramesh

The Poet

दिविक रमेश

Divik Ramesh

Draupadi Humiliated

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Draupadi Humiliated

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Unka Dard Meri Zuban carries.