№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Karna and Kunti

Karuna

तू तो है न मेरे पास

Tu To Hai Na Mere Paas

Divik Ramesh
2 min read 8 versesमाँmotherसपना

8 verses · ~2 min

सोचता हूँ क्या था कारण— माँ को ही नहीं लेने आया सपना या सपने की ही नहीं थी पहुँच माँ तक ।

माँ गा सकती थी सुना सकती थी कहानियाँ रख सकती थी व्रत माँग सकती थी मन्नतें पर ले नहीं सकती थी सपने ।

चाह ज़रूर थी माँ के पास जैसे होती है जीने के लिए जीती हुई किसी भी औरत के पास ।

माँ हँस लेती थी पूरी होने पर चाह और रो लेती थी न होने पर पूरी ।

सोचता हूँ क्यों नहीं था माँ के पास सपना क्यों माँ बैठाकर मुझे गोद में कहती थी गाहे-बगाहे तू तो है न मेरे पास और क्या चाहिए मुझे?

पर आज तक नहीं समझ पाया कैसे करूँ बंद इस वाक्य को — तू तो है न मेरे पास लगाऊँ पूर्णविराम या ठोक दूँ चिह्न प्रश्नवाचक ।

सोचता हूँ न हुआ होता मैं तो शायद खोज पाती माँ अपना कोई सपना । थमी न रहती सिर्फ़ चाह पर । शायद न रही होती राह माँ की आंखें नहर की । यूँ ढलके न हुए होते बहुत उन्नत हुए होते थन माँ के भी ।

या मेरा ही होना न हुआ होता लीक पर घिसटती बैलगाड़ी-सा जिसका कोई सपना नहीं होता ।

इति

Divik Ramesh

The Poet

दिविक रमेश

Divik Ramesh

Karna and Kunti

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Karna and Kunti

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Tu To Hai Na Mere Paas carries.