
स्वर वासन्ती
Swar Vasanti
Buddhinath Mishra
9 verses · ~28 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

11 verses · ~3 min
जीवन के हर पोर-पोर पर नाच रहा जुगनू-सा पानी ।
निकले संकल्पों के अंकुर तोड़ वर्जना की दीवारें लेकर शुभ-संदेश उड़ रहे नभ के वायस पंख पसारे । भींगे तप्त प्राण वर्षों के महके स्वप्न विजन मरुथल में ये अमोल मोतियाँ समेटूँ मैं अपने रीते आँचल में ।
स्वप्निल इन्द्रधनुष पर झूलेगी मेरी साधना सयानी ।
लोकगीत की बिरहिन बाँधे पंखों में संदेश पवन के पैरों में बिजलियाँ बाँध कर नाचे परियाँ द्वार गगन के । रोम-रोम व्याकुल होता तन जब समीर के झोंके परसे जैसे किसी सुनहरी ग्रीवा पर उछ्वास पिया के बरसे ।
झूम रही तापसी अपर्णा पहने आज चुनरिया धानी ।
गगरी फूटी क्या रसवन्ती की उस स्वर्गंगा के तट पर या कान्हा ने कंकड़ फेंका किसी गोपिका के मधुघट पर । कितना प्राणवन्त हाला है राधे, तेरी आज न जाने छिगुनी से छींटों जिस पर उठकर लगता बाँसुरी बजाने ।
धुलकर और चमकती रेखांकित यक्षों की प्रेम-कहानी ।
गूँज रही धरती से अम्बर पावस की उन्मुक्त रागिनी तरल पुष्प के शर बरसाती लुक-छिपकर घन की सुहागिनी । मन का मृग भर रहा कुलाँचें लुप्त हुई मृगतृष्णा जग की पंकिल खेतों की मेड़ों पर बढ़ी नीलिमा बहकी-बहकी ।
कैसे पथिक चले निर्भय हो डूबी पगडंडी अनजानी ।
आर्द्र-अम्बरा ‘वृक्षपरी’ के किसलय-से अरुणाधर फड़के आहत-उर भुजंगिनी सरि के दोनों कोर प्रणय की छलके । वशीकरण के यन्त्र मनोहर कीलित मेंहदी से हाथों पर मुखर हुई सर्जना-सुरभि निर्माता के मृदु आघातों पर ।
मैं बनता बादल राजा यदि कोई बनती बिजली रानी ।
इति

Paired Painting
Krishna and Radha in a Monsoon Landscape
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Jugnu-Sa Pani carries.