
ऋतुराज इक पल का
Rituraj Ik Pal Ka
Buddhinath Mishra
7 verses · ~16 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

9 verses · ~2 min
सब्ज़परी उतरी आँगन में फूटी गन्ध सुमन बन । अनजानी डाली पर कुहके मेरा बनजारा मन ।
विकल समीर फिरे वन-वन कुण्डल में कस्तूरी भर कम्पित कलियों के अधरों पर बिछे मदिर श्रम-सीकर । ऐसी आँधी उठी वसन्ती लिपटी दिशा गगन से वल्लरियाँ द्रुम से आलिंगित स्वप्निल प्रीति सृजन से ।
किन नयनों ने क्या कर डाला सुलगा तरु का यौवन बिछुड़ रहा है वृन्त-वृन्त से मेरा अलसाया तन ।
उषा रंगिनी बाँट गई प्राची-नभ से कुंकुम जो मानस-मानस सिमटे वे उपजे अनुराग-कुसुम हो । अनहोनी कुछ हुई न फिर क्यों भाव जगे सिहरन के? अर्थ नए अँखुए-से निकले ठूँठ शब्द के तन से ।
इन्द्रधनुष के पंख लगा क्यों राधा विचरे तृण-तृण? सँवर रहा यादों की फुनगी पर जब अनब्याहा प्रण ।
दृग के कुमुद गिनें तारे या ढूँढें शशि वह निर्मम आग लगाए जल में जिसकी आँखमिचौनी का क्रम । जग की सभी व्यथाएं संचित इस अणु-से अंकुर में सत्रहवर्षी उर में ।
पीकर उनकी सुरभि सलोनी उगी मंजरी नूतन हर मधुकण में प्रतिबिम्बित कर्पूरी उनका आनन ।
कौन बुलाकर द्वार पूजती वायस साँझ-सबेरे बचा न अब यह स्नेह जलाये पय से दिये कनेरे । कितने पीर-पतंगों को उसने अन्तर में बाँधा ले उधार उल्लास कि जिस आँचल ने मयन अराधा ।
फहराएँ उनकी समाधि पर कुसमायुध के केतन खुला रहा जिनका अनन्त की ओर सदा वातायन ।
इति

Paired Painting
Radha Waiting for Krishna
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Swar Vasanti carries.