
यूँ चम्पई रंगत प सिंदूरी निखार है
Yun Champayi Rangat Pa Sinduri Nikhar Hai
Amitabh Tripathi ‘Amit’
8 verses · ~16 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Shringara
Ashik Yahan Zulf-O-Lab-O-Rukhsar Bahut Hain
Amitabh Tripathi ‘Amit’9 verses · ~2 min
आशिक यहाँ जुल्फ-ओ-लब-ओ-रुख़्सार[1] बहुत हैं। पाने को इक झलक ही तलबगार बहुत हैं।
रेशम से भी नाजुक हैं तेरी जुल्फ के रेशे, कहते हैं मगर इनमें गिरिफ़्तार बहुत हैं।
इतने फ़राख़-दिल[2] तो नहीं लोग यहाँ के, क्या बात है के उसके मददगार बहुत हैं।
अब दिल में बस गये हो सितम चाहे जो करो, वरना तो परी-रुख़ सरे संसार बहुत हैं।
किस - किस का भरे जाम कि जब एक है साक़ी, प्यासे लब-ओ-सागर[3] लिये मैख़्वार बहुत हैं।
पतझड़ था और धूप थी, माली था अकेला, अब खु़शबू-ए-चमन है तो हक़दार बहुत हैं।
चुपके से देखते हैं दिखावा नहीं करते, मासूम न कह देना वो हुशियार बहुत हैं।
अब रुक गई है आ के कहानी तेरी हाँ पर, अर्मान मेरे दिल में मेरे यार बहुत हैं।
जलवानुमा है हुस्न जो पाकीज़: करदे दिल, यूँ तो गुदाज़ हुस्न के बाजार बहुत हैं।
इति

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The Saki
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