№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

Canvas
Pandavas and Krishna on a Palace Balcony

Shanta

सांसों का हिसाब

Sanso Ka Hisab

Shivamangal Singh 'Suman'
8 min read 1 versesसाँसहिसाबजीवन

1 verses · ~8 min

तुम जो जीवित कहलाने के हो आदी तुम जिसको दफ़ना नहीं सकी बरबादी तुम जिनकी धड़कन में गति का वन्दन है तुम जिसकी कसकन में चिर संवेदन है तुम जो पथ पर अरमान भरे आते हो तुम जो हस्ती की मस्ती में गाते हो तुम जिनने अपना रथ सरपट दौड़ाया कुछ क्षण हाँफे, कुछ साँस रोककर गाया तुमने जितनी रासें तानी, मोड़ी हैं तुमने जितनी सांसें खींची, छोड़ी हैं उनका हिसाब दो और करो रखवाली कल आने वाला है साँसों का माली कितनी साँसों की अलकें धूल सनी हैं कितनी साँसों की पलकें फूल बनी हैं? कितनी साँसों को सुनकर मूक हुए हो? कितनी साँसों को गिनना चूक गये हो? कितनी सांसें दुविधा के तम में रोयीं? कितनी सांसें जमुहाई लेकर खोयीं? जो सांसें सपनों में आबाद हुई हैं जो सांसें सोने में बर्बाद हुई हैं जो सांसें साँसों से मिल बहुत लजाईं जो सांसें अपनी होकर बनी पराई जो सांसें साँसों को छूकर गरमाई जो सांसें सहसा बिछुड़ गईं ठंडाई जिन साँसों को छल लिया किसी छलिया ने उन सबको आज सहेजो इस डलिया में तुम इनको निर्रखो परखो या अवरेखो फिर साँस रोककर उलट पलट कर देखो क्या तुम इन साँसों में कुछ रह पाये हो? क्या तुम इन साँसों से कुछ कह पाये हो? इनमें कितनी ,हाथों में गह सकते हो? इनमें किन किन को अपनी कह सकते हो? तुम चाहोगे टालना प्रश्न यह जी भर शायद हंस दोगे मेरे पागलपन पर कवि तो अदना बातों पर भी रोता है पगले साँसों का भी हिसाब होता है? कुछ हद तक तुम भी ठीक कह रहे लेकिन सांसें हैं केवल नहीं हवाई स्पंदन यह जो विराट में उठा बबंडर जैसा यह जो हिमगिरि पर है प्रलयंकर जैसा इसके व्याघातों को क्या समझ रहे हो? इसके संघातों को क्या समझ रहे हो? यह सब साँसों की नई शोध है भाई! यह सब साँसों का मूक रोध है भाई जब सब अंदर अंदर घुटने लगती है जब ये ज्वालाओं पर चढ़कर जगती है तब होता है भूकंप श्रृंग हिलते हैं ज्वालामुखियों के वो फूट पड़ते हैं पौराणिक कहते दुर्गा मचल रही है आगन्तुक कहते दुनिया बदल रही है यह साँसों के सम्मिलित स्वरों की बोली कुछ ऐसी लगती नई नई अनमोली पहचान जान में समय समय लगा करता है पग पग नूतन इतिहास जगा करता है जन जन का पारावार बहा करता है जो बनता है दीवार ढहा करता है सागर में ऐसा ज्वार उठा करता है तल के मोती का प्यार तुला करता है सांसें शीतल समीर भी बड़वानल भी सांसें हैं मलयानिल भी दावानल भी इसलिए सहेजो तुम इनको चुन चुन कर इसलिए संजोओइनको तुम गिन गिन कर अबतक गफ़लत में जो खोया सो खोया अब तक अंतर में जो बोया सो बोया अब तो साँसों की फ़सल उगाओ भाई अब तो साँसों के दीप जलाओ भाई तुमको चंदा से चाव हुआ तो होगा तुमको सूरज ने कभी छुआ तो होगा? उसकी ठंडी गरमी का क्या कर डाला? जलनिधि का आकुल ज्वार कहाँ पर पाला? मरुथल की उड़ती बालू का लेखा दो प्याले अधर्रों की अकुलाई रेखा दो तुमने पी ली कितनी संध्या की लाली? ऊषा ने कितनी शबनम तुममें ढालीं? मधुऋुतु को तुमने क्या उपहार दिया था? पतझर को तुमने कितना प्यार किया था? क्या किसी साँस की रगड़ ज्वाला में बदली? क्या कभी वाष्प सी साँस बन गई बदली? फिर बरसी भी तो कितनी कैसी बरसी? चातकी बिचारी कितनी कैसी तरसी? साँसों का फ़ौलादी पौरुष भी देखा? कितनी साँसों ने की पत्थर पर रेखा हर साँस साँस की देनी होगी गिनती तुम इनको जोड़ों बैठ कहीं एकाकी बेकार गईं जो उनकी कर दो बाक़ी जो शेष बचे उनका मीजान लगा लो जीवित रहने का अब अभिमान जगा लो मृत से जीवित का अब अनुपात बता दो साँसों की सार्थकता का मुझे पता दो लज्जित क्यों होने लगा गुमान तुम्हारा? क्या कहता है बोलो ईमानदार तुम्हारा? तुम समझे थे तुम सचमुच मैं जीते हो तुम ख़ुद ही देखो भरे या कि रीते हो जीवन की लज्जा है तो अब भी चेतो जो जंग लगी उनको ख़राद पर रेतो जितनी बाक़ी हैं सार्थक उन्हें बना लो पछताओ मत आगे की रक़म भुना लो अब काल न तुमसे बाज़ी पाने पाये अब एक साँस भी व्यर्थ न जाने पाये तब जीवन का सच्चा सम्मान रहेगा यह जिया न अपने लिए मौत से जीता यह सदा भरा ही रहा न ढुलका रीता

इति

Shivamangal Singh 'Suman'

The Poet

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

Shivamangal Singh 'Suman'

Pandavas and Krishna on a Palace Balcony

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Pandavas and Krishna on a Palace Balcony

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Sanso Ka Hisab carries.