
दीपावली
Deepawali
Amitabh Tripathi ‘Amit’
2 verses · ~9 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Shanta
Deepawali Mein Satyagraha
Shriprakash Shukla15 verses · ~4 min
अबकी दीपावली में मन काफ़ी हरा और भरा था अबकी बरसात भी ठीक-ठाक हुई थी और अबकी मौसम भी काफी अच्छा था धान भी खूब गदराया हुआ था
यह खेतों से उठकर आई मिट्टी के लहराने का समय था तालाब थका और शांत था सूरज शिथिल और संकोच से भरा हुआ था और आदमी अपने हाथों की छुवन के बीच हरी-हरी दूबों जैसा मुलायम और गर्म था
यहाँ बरसात का थिहाया हुआ संकोच था जिसमें सूरज की किरनें आहिस्ता आहिस्ता सँवला रही थी और धरती अपनी दरारों को पाट रही थी
यहाँ पिछले के छूट गए का उत्साह था तो उमगते यौवन के बीच मुस्कुराते जाने का उन्माद था
यहाँ सावन से ही कार्तिक में फलाँगने की कोशिश थी जहाँ बेसुध नायिका की तरह उमड़ता हुआ बाज़ार था जिसमें सूखी बत्तियों से नौ मन तेल टपक रहा था और सैकड़ों दीपक बगैर बत्ती के चमक रहे थे
यहां पूर्णिमा की गमक थी तो आषाढ़ की धमक जहाँ चारों ओर यमक ही यमक था ।
यहाँ बाज़ार में रोशनी के साथ ढेर सारी ध्वनियाँ थीं लावा, लाई और गट्टे के बीच तरह-तरह के मोम की बहार थी
यहां घूरे से लेकर पूरे तक सरसों के तेल की महक थी फिर भी बाती के नोक भर की जगह दीये में शेष थी ।
कहीं-कहीं भड़ेसर भी दिख ही रहा था जो कुम्हार के चाक से निकलने के बाद पहली बार स्वाधीनता का गट्टा चख रहा था ।
यहाँ सब कुछ ठीक-ठाक था और ढलती शाम से ही चढ़ती रात का इंतज़ार था
यहाँ प्रेम चारों ओर था और मिलन की एक सामूहिक बेचैनी सतह पर तैर रही थी ।
कहीं राज्याभिषेक था तो कहीं नरकासुर का बध कहीं इंद्र का दर्प था तो कहीं कृष्ण का संहार कहीं लक्ष्मी की आवाजाही थी तो कहीं दरिद्र के ख़िलाफ़ अभियान कहीं सुंदर-सुंदर पाँव थे तो कहीं आवक पर फिसलते हुये दाँव ।
यहाँ सब कुछ था शाम थी, रात थी, उत्सव था, उत्साह था, लोग थे, बाज़ार था, पूजा थी, पुण्य था, लेकिन नहीं थे तो किसिम-किसिम के कीड़े जो राज्योत्सव के इस मौसम में श्रद्धालुओं की शक़्ल में प्रतिवर्ष यहाँ पर आ जाया करते थे कभी न लौटने की अनकही कहानियों के साथ ।
अब यह बदलते मौसम का तकाजा था या कीड़ों के नागरिक समाज का विस्तार कहना कठिन है लेकिन इतना तय है कि कीड़ो की दुनिया में यह पहला सत्याग्रह था जहाँ कीड़ों ने जलने से मना कर दिया था!
(दीपावली, 2010)
इति

Paired Painting
Untitled Idyllic Snapshot of Bustling Temple Life
This evocative masterpiece captures the soul of traditional Indian spirituality, frozen in the golden glow of a sanctum. Rao Bahadur M. V. Dhurandhar, a titan of the Bombay School of Art, possessed an extraordinary ability to weave the sacred with the everyday. In this composition, he invites us into the hushed, luminous intimacy of a temple interior, where women are gathered in an act of collective devotion. Their graceful postures, the vibrant folds of their saris, and the offerings of fruits and flowers reveal a moment of profound communion with the divine. The golden idol at the center acts as a spiritual anchor, radiating light that illuminates the faces of the devotees, suggesting that the true temple lies in the shared sincerity of the human heart.
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Deepawali Mein Satyagraha carries.