
फ़रार
Farar
Sahir Ludhianvi
6 verses · ~24 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

7 verses · ~1 min
मुहब्बत के खिलाफ़ लामबंद तहजीब का मज़ाक जारी है
जारी है फिर भी फूलों का खिलना बर्फ़ का गिरना धूप का हँसना और अँधेरे का खिलखिलाना
पहाड़ों की रंगत बरकरार है पहले की तरह पहले की तरह बरकरार है नदियों की रफ़्तार झरनों की ललकार बरकरार है पहले की तरह
जानवरों की नीद में खलल पड़ रहा है इसके वावजूद इसके वावजूद बच्चे संजीदा हुए हैं रह-रहकर औरतें ज़रूरत से ज़्याद ख़ामोश होती गई हैं इसके वावजूद
मुहब्बत के खिलाफ़ लामबंद तहजीब का मज़ाक जारी है
रचनाकाल: 30.04.1991
शलभ श्रीराम सिंह की यह रचना उनकी निजी डायरी से कविता कोश को चित्रकार और हिन्दी के कवि कुँअर रवीन्द्र के सहयोग से प्राप्त हुई। शलभ जी मृत्यु से पहले अपनी डायरियाँ और रचनाएँ उन्हें सौंप गए थे।
इति

Paired Painting
The Pandava and Kaurava armies face each other
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Nafrat Ka Mahaul carries.