№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

Loading the archive

MM · XXVI

Canvas
Saraswati in Concert

Shanta

कल भी मैं सफ़र में था,आज भी सफ़र में हूँ

Kal Bhi Main Safar Mein Tha, Aaj Bhi Safar Mein Hoon

Shalabh Shriram Singh
1 min read 7 versesसफ़रवक़्तमंज़िल

7 verses · ~1 min

कल भी मैं सफ़र में था, आज भी सफ़र में हूँ वक़्त के लबों पर हूँ, उम्र की नज़र में हूँ

महफ़िलों की बातें क्यों ,मंज़िलों के चर्चे क्या आपके शहर में हूँ, अपनी रहगुज़र में हूँ

अपनी यकताहाली का ज़िक्र मैं करूँ किससे अक्स तो नहीं हूँ मै फिर भी चश्मेतर में हूँ

तिनका मत समझियेगा मुझको बहरे आलम का आदमी हूँ हस्ती की आख़िरी सतर में हूँ

अपने मिलने वालों से ऐ शलभ यह कहना है बुलबुलों के नगमों में तितलियों के पर में हूँ

रचनाकाल: 30 जुलाई 1984, भोपाल

शलभ श्रीराम सिंह की यह रचना उनकी निजी डायरी से कविता कोश को चित्रकार और हिन्दी के कवि कुँअर रवीन्द्र के सहयोग से प्राप्त हुई। शलभ जी मृत्यु से पहले अपनी डायरियाँ और रचनाएँ उन्हें सौंप गए थे।

इति

Shalabh Shriram Singh

The Poet

शलभ श्रीराम सिंह

Shalabh Shriram Singh

Saraswati in Concert

Paired Painting

Saraswati in Concert

Open the viewer →

If this held you

Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Kal Bhi Main Safar Mein Tha, Aaj Bhi Safar Mein Hoon carries.