
इक लम्हा ख़ुशी के लिये दुनिया सफ़र में है
Ik Lamha Khushi Ke Liye Duniya Safar Mein Hai
Amitabh Tripathi ‘Amit’
7 verses · ~12 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Shanta
Kal Bhi Main Safar Mein Tha, Aaj Bhi Safar Mein Hoon
Shalabh Shriram Singh7 verses · ~1 min
कल भी मैं सफ़र में था, आज भी सफ़र में हूँ वक़्त के लबों पर हूँ, उम्र की नज़र में हूँ
महफ़िलों की बातें क्यों ,मंज़िलों के चर्चे क्या आपके शहर में हूँ, अपनी रहगुज़र में हूँ
अपनी यकताहाली का ज़िक्र मैं करूँ किससे अक्स तो नहीं हूँ मै फिर भी चश्मेतर में हूँ
तिनका मत समझियेगा मुझको बहरे आलम का आदमी हूँ हस्ती की आख़िरी सतर में हूँ
अपने मिलने वालों से ऐ शलभ यह कहना है बुलबुलों के नगमों में तितलियों के पर में हूँ
रचनाकाल: 30 जुलाई 1984, भोपाल
शलभ श्रीराम सिंह की यह रचना उनकी निजी डायरी से कविता कोश को चित्रकार और हिन्दी के कवि कुँअर रवीन्द्र के सहयोग से प्राप्त हुई। शलभ जी मृत्यु से पहले अपनी डायरियाँ और रचनाएँ उन्हें सौंप गए थे।
इति

Paired Painting
Saraswati in Concert
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Kal Bhi Main Safar Mein Tha, Aaj Bhi Safar Mein Hoon carries.