
ज़माने को बदलना है
Zamane Ko Badalna Hai
Shalabh Shriram Singh
7 verses · ~52 lines · 3 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

1 verses · ~2 min
जिस दिन हमने तोडी थीं पहली दीवारें, (तुम्हें याद है?) छाती में उत्साह कंठ में जयध्वनियां थीं। उछल-उछल कर गले मिले थे, फिरे बांटते बडी रात तक हम बधाइयां। काराघर में फैल गई थी यही सनसनी- लो कौतूहल शांत हो गया। फिर ये आए- ये जो दीवारों के बाहर के वासी थे: उसी तरह इनके भी पैरों में निशान थे, उसी तरह इनके हाथों में रेखाएं- उसी तरह इनकी भी आंखों में तलाश थी। परिचय स्वागत की जब विधियां खत्म हो गई तब ये बोले- यहां कहीं कुछ नया नहीं है। और हमें तब ज्ञात हुआ था (तुम्हें याद है?) इसके आगे अभी और भी हैं दीवारें। तबसे हमने तोडी हैं कितनी दीवारें, कितनी बार लगाए हमने जय के नारे, पुष्ट साहसी हाथों की अंतिम चोटों से जब जब अरराकर टूटीं जिद्दी प्राचीरें, नभ में उडकर धूल गई है- (किलकारी भी!) लेकिन, हर बार क्षितिज पर, क्रुध्द वृषभ के आगे लाल पताका जैसी, धीरे-धीरे फिर दीवारें उग आई हैं। नथुने फुला-फुला कर हमने घन मारे हैं। अजब तरह की है यह कारा जिसमें केवल दीवारें ही दीवारें हैं, अजब तरह के कारावासी, जिनकी किस्मत सिर्फ तोडना सिर्फ तोडना।
इति

Paired Painting
Battle of Haldighati
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