№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Lady Playing the Swarbat

Shringara

तेरी मुक्ति

Teri Mukti

Pratibha Saxena
2 min read 6 versesमुक्तिगीतप्रिय

6 verses · ~2 min

मेरे स्वर तब तक न थमेंगे ,जब तक जीवन बीत न जाये तेरी मुक्ति तभी है जिस दिन मेरी वाणी गीत न गाये! और नहीं तो बँधे रहो , मेरे स्वर के बंधन चंचल हैं! बरबस मन में उतर चलेंगे , मेरे अंतर्गीत विकल हैं!

तुम न रहो तो शायद फिर , सारा संसार विजन बन जाये! तुम न सुनो तो हृत्तंत्री की तान न फिर शायद जग पाये

तुम न सुनो तो संभव है , मेरी वाणी फिर गीत न गाये! तुम न लखो तो शायद यह अस्तित्व , जगत में ही घुल जाये!

चलती रहें उजाड़ हवायें , जीवन की आशायें बिखरा , छायेगी अनजान बने से सपनों पर बेसुध सी तंद्रा!

अब के बाद न जाने कितने दिन गुमसुम से ढल जायेंगे जाने कितने आज सदा को , इसी तरह बन कल जायेंगे!

दृष्टि उठेगी महाशून्य में , सम्मुख कोई चित्र न होगा! अब के बाद अकेलेपन का शायद कोई मित्र न होगा! दूर रहो तो एक मिलन की चाह जगाते रहना प्रिय तुम ,! मेरे स्वर की दुनियां में , मृदु राग जगाते रहना प्रिय तुम! यों ही रहना -कहना है जब तक ये साँसें रूठ न जायें तेरी मुक्ति तभी है जिस दिन मेरी वाणी गीत न गाये!

इति

Pratibha Saxena

The Poet

प्रतिभा सक्सेना

Pratibha Saxena

Lady Playing the Swarbat

Paired Painting

Lady Playing the Swarbat

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Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Teri Mukti carries.