№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Sita and the Golden Deer

Karuna

सोने का हिरन

Sone Ka Hiran

Pratibha Saxena
2 min read 5 versesरामायणसीतामृगतृष्णा

5 verses · ~2 min

काहे राम जी से माँग लिया सोने का हिरन, सोनेवाली लंका में जा के रह ले सिया!

अनहोनी ना विचारी जो था आँखों का भरम, छोड़ आया महलों को, काहे ललचा रे, मन! कंद-मूल फल-फूल तुझे काहे न रुचे, धन वैभव की चाह कहीं रखी थी छिपा, सोने रत्नों की कौंध आँखें भर ले, सिया!

वनवास लिया तो भी तो उदासी ना भया, कुछ माँगे बिना जीने का अभ्यासी ना हुआ! मृगछाला सोने की तो मृगतृष्णा रही, तू भी जान दुखी हरिनी के मन की विथा! कहीं सोने की तू ही न बन जाये री सिया!

घर-द्वार का सपन काहे पाला मेरे मन! जब लिखी थी कपाल में जनम की भटकन, छोटे देवर को कठोर वचन बोले थे वहाँ, अब लोगों में पराये दिन रात पहरा, चुपचाप यहाँ सहेगी पछतायेगा हिया!

काहे राम जी से माँग लिया सोने का हिरन, सोनेवाली लंका में जा के रह ले सिया!

इति

Pratibha Saxena

The Poet

प्रतिभा सक्सेना

Pratibha Saxena

Sita and the Golden Deer

Paired Painting

Sita and the Golden Deer

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Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Sone Ka Hiran carries.