№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Sita Bhumipravesh

Karuna

अभिशप्त

Abhishapt

Pratibha Saxena
2 min read 5 versesसीताSitaराम

5 verses · ~2 min

रात का धुँधलका, सिर्फ़ तारों की छाँह, मैंने देखा -- मन्दिर से निकल कर एक छायामूर्ति चली जा रही है विजन वन की ओर! आश्चर्य-चकित मैंने पूछा,

' देवि, आप कौन हैं? रात्रि के इस सुनसान प्रहर में, अकेली कहाँ जा रही हैं?'

वह चौंक गई,कुछ रुकी बोली, ' मैं जा रही हूँ राम के वामांग से उठ कर, चिर दिन के लिए, क्योंकि विश्वास और सत्य प्रमाण - सापेक्ष नहीं होते! चेतनामयी नारी का स्थान जहाँ ले ले सोने की मूरत, मर्यादा का यह आचार, मैं, वैदेही की चेतना- छाया, जड़ -सी देखती रह गई! अब मैं जा रही हूँ सदा-सदा के लिये!

'अब?इतने समय बाद? आज? " मेरे मुँह से निकल पड़ा!

वह उदास सी मुस्कराई - 'तुम आज देख पाई हो! मैं तो जा चुकी शताब्दियों पहले, सरयू अपार जल-राशि बहा चुकी है तब से, श्री-हत अयोध्या अभिशप्त है तभी से!'

इति

Pratibha Saxena

The Poet

प्रतिभा सक्सेना

Pratibha Saxena

Sita Bhumipravesh

Paired Painting

Sita Bhumipravesh

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Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Abhishapt carries.