
दुर्गम्या
Durgamya
Pratibha Saxena
12 verses · ~38 lines · 2 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

9 verses · ~4 min
बहुत दिन हो गए नदिया बड़ी संयत रही है, लहर के जाल में सब-कुछ समाए जा रही है . कहीं कुछ शेष बच जाता, जमा बैठातलों में .
बहुत दिन से न जागा वेग, मंथर वह रही बस, प्रवाहित मौन-सी चुपचाप धारा, समेटे जाल सारे, शान्त जल-तल में समाए . कहीं बरसा न पानी, हिम-शिखर पिघला न कोई.
समेटे क्यों नहीं पथ के विरोधों को उमड़ने दो, बहुत दिन हो गए हैं. सभी कुछ छोड़ बढ़ जाए कहीं आगे- कगारें तोड़ कर लहरें समेंटें सब, करें प्लावित!
बहुत दिन हो गए, सब कुछ देखते- रहते, बहुत दिन हो गए, यों एक सा बहते, कहीं जो बाढ़ पानी में उमड़ आए . नदी को बाँधना मत, रोकना मत. शाप है जल का बहुत कुछ तोड़ जाएगा! सभी कुछ टूट बिखरे कुछ न छोड़ेगा ..बहा देगा!
तभी फिर देखना तट-बंध सारे तोड़ते ढहते, कि हाहाकार के स्वर वेग में बहते, लगे प्रतिबंध सारे मोड़ते अपनी तरह बस एक झटके से, कगारों के बिना बढती नदी के वेग को चढते, प्रलय का रूप धरने से कहो फिर कौन टोकेगा? किसीमें दम कि चढ़ते पानियों का वेग रोकेगा. किसी में दम उफनती बाढ़ का आवेग रोकेगा?.
बहुत दिन हो गए चुपचाप है, बहती हुई भी शान्त संयत सी, कि गहरी घूर्णियों में घट रहा क्या कौन जानेगा! बहुत दिन हो गए ये तट नहीं भीगे. लहर कोई बहा दे रेत के डूहे, बराबर कर सतह इकसार कर डाले, तलों में जमी तलछट फिर निकल कर भूमि पर छाए, जिन्हें कर चूर बिखराया विरोधों को, सभी कुछ छोड़ बढ़ जाए, कि वर्जित सीढ़ियाँ चढ़ते, ढहाते पुल बढ़ी आगे चली जाए. कि पानी, ढूँढ लेता राह अपनी तोड़ बाधाएँ .
नदी के पाट मत देखो, नदी के घाट मत रोको. बहेगी मुक्त हो, प्रतिबंध तोड़ेगी, प्रवाहों मे बहाती हरहराती, कुछ न छोड़ेगी . अगर फिर तुल गई, रुख धार मोड़ेगी.
युगों के बाद उन रीते कछारों को कभी देखो, कभी नदिया रहे, गहरे कगारों को जभी देखो- किसी अन्याय का प्रतिफल समझ लेना, नदी को दोष मत देना.
अभी तो शान्त बहने दो, तरल-जल स्वच्छ रहने हो. अनादर और मनमानी नहीं सह पायगी नदिया, अगर समझो, इशारों में बहुत कह जायगी नदिया . समुन्दर की तरफ हर राह नदिया की, रुकेगी क्यों? बनाती रास्ता बढ़ जायगी नदिया. बहुत दिन हो गए
इति

Paired Painting
Rama is Placated by the Fearful Sea God
In the climactic buildup to the Yuddhakanda of the Ramayana, Lord Rama reaches the shores of the vast ocean, seeking a passage for his army to reach Lanka. When the ocean god remains silent to his entreaties, Rama, overcome by divine indignation, takes up his bow to dry up the very waters that defy his path. Seeing the impending destruction of the aquatic world, Varuna, the Lord of the Oceans, emerges in terror and humility to seek refuge and forgiveness at the feet of the righteous prince. This painting captures that fleeting, breathless moment of cosmic tension, where the wrath of the divine meets the humbling power of submission.
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If this held you
Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Bahut Din Ho Gaye carries.