
दीपक अब रजनी जाती रे
Deepak Ab Rajni Jaati Re
Mahadevi Varma
4 verses · ~13 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

5 verses · ~1 min
दीप मेरे जल अकम्पित, घुल अचंचल! सिन्धु का उच्छवास घन है, तड़ित, तम का विकल मन है, भीति क्या नभ है व्यथा का आँसुओं से सिक्त अंचल! स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें, मीड़, सब भू की शिरायें, गा रहे आंधी-प्रलय तेरे लिये ही आज मंगल
मोह क्या निशि के वरों का, शलभ के झुलसे परों का साथ अक्षय ज्वाल का तू ले चला अनमोल सम्बल!
पथ न भूले, एक पग भी, घर न खोये, लघु विहग भी, स्निग्ध लौ की तूलिका से आँक सबकी छाँह उज्ज्वल
हो लिये सब साथ अपने, मृदुल आहटहीन सपने, तू इन्हें पाथेय बिन, चिर प्यास के मरु में न खो, चल!
धूम में अब बोलना क्या, क्षार में अब तोलना क्या! प्रात हंस रोकर गिनेगा, स्वर्ण कितने हो चुके पल! दीप रे तू गल अकम्पित, चल अंचल!
इति

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Deep Mere Jal Akampit carries.