№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Portrait of Chola Emperor Rajaraja I from the Brihadisvara Temple Murals

Shanta

भक्ति की महिमा

Bhakti Ki Mahima

Kabir
6 min read 20 versesकबीरKabirभक्ति

20 verses · ~6 min

भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनन्त | ऊँच नीच घर अवतरै, होय सन्त का सन्त ||

की हुई भक्ति के बीज निष्फल नहीं होते चाहे अनंतो युग बीत जाये | भक्तिमान जीव सन्त का सन्त ही रहता है चाहे वह ऊँच - नीच माने गये किसी भी वर्ण - जाती में जन्म ले |

भक्ति पदारथ तब मिलै, तब गुरु होय सहाय | प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय ||

भक्तिरूपी अमोलक वस्तु तब मिलती है जब यथार्थ सतगुरु मिलें और उनका उपदेश प्राप्त हो | जो प्रेम - प्रीति से पूर्ण भक्ति है, वह पुरुषार्थरुपी पूर्ण भाग्योदय से मिलती है |

भक्ति जो सीढ़ी मुक्ति की, चढ़ै भक्त हरषाय | और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझो आय ||

भक्ति मुक्ति की सीडी है, इसलिए भक्तजन खुशी - खुशी उसपर चदते हैं | आकर अपने मन में समझो, दूसरा कोई इस भक्ति सीडी पर नहीं चढ़ सकता | (सत्य की खोज ही भक्ति है)

भक्ति बिन नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय | शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय ||

कोई भक्ति को बिना मुक्ति नहीं पा सकता चाहे लाखो लाखो यत्न कर ले | जो गुरु के निर्णय वचनों का प्रेमी होता है, वही सत्संग द्वरा अपनी स्थिति को प्राप्त करता है |

भक्ति गेंद चौगान की, भावै कोइ लै लाय | कहैं कबीर कुछ भेद नहिं, कहाँ रंक कहँ राय ||

भक्ति तो मैदान में गेंद के समान सार्वजनिक है, जिसे अच्छी लगे, ले जाये | गुरु कबीर जी कहते हैं कि, इसमें धनी - गरीब, ऊँच - नीच का भेदभाव नहीं है |

कबीर गुरु की भक्ति बिन, अधिक जीवन संसार | धुँवा का सा धौरहरा, बिनसत लगै न बार ||

कबीर जी कहते हैं कि बिना गुरु भक्ति संसार में जीना धिक्कार है | यह माया तो धुएं के महल के समान है, इसके खतम होने में समय नहीं लगता |

जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय | नाता तोड़े गुरु बजै, भक्त कहावै सोय ||

जब तक जाति - भांति का अभिमान है तब तक कोई भक्ति नहीं कर सकता | सब अहंकार को त्याग कर गुरु की सेवा करने से गुरु - भक्त कहला सकता है |

भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव | भक्ति भाव एक रूप हैं, दोऊ एक सुभाव ||

भाव (प्रेम) बिना भक्ति नहीं होती, भक्ति बिना भाव (प्रेम) नहीं होते | भाव और भक्ति एक ही रूप के दो नाम हैं, क्योंकि दोनों का स्वभाव एक ही है |

जाति बरन कुल खोय के, भक्ति करै चितलाय | कहैं कबीर सतगुरु मिलै, आवागमन नशाय ||

जाति, कुल और वर्ण का अभिमान मिटाकर एवं मन लगाकर भक्ति करे | यथार्थ सतगुरु के मिलने पर आवागमन का दुःख अवश्य मिटेगा |

कामी क्रोधी लालची, इतने भक्ति न होय | भक्ति करे कोई सुरमा, जाति बरन कुल खोय ||

कामी, क्रोधी और लालची लोगो से भक्ति नहीं हो सकती | जाति, वर्ण और कुल का मद मिटाकर, भक्ति तो कोई शूरवीर करता है |

इति

Kabir

The Poet

कबीर

Kabir

1398 · 1518

To speak of Kabir within the ordinary parameters of literary biography is almost impossible. Born in the fifteenth century to a Muslim weaver's family in the sacred Hindu city of Banaras, he became a voice that refused to be domesticated by any temple, mosque, or scholarly apparatus. Kabir claimed no scripture, no caste, and no sacred language as his exclusive property. He stood at the loom of reality and wove his dohas (devastating two-line couplets) from the raw thread of direct spiritual encounter. His critique was not merely religious but civilizational. He asked with the serene ferocity of an awakened mind why human beings had chosen the architecture of division over the open sky of the divine. Centuries have passed, empires have crumbled, and languages have shifted. Yet, Kabir's couplets are still recited in village squares and debated in universities today. He requires no temple because he built one inside language itself. He is the conscience of the Indian soul.

Portrait of Chola Emperor Rajaraja I from the Brihadisvara Temple Murals

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Bhakti Ki Mahima carries.