№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

Canvas
Shivaji Maharaj at Agra

Veera

पूजना चाहता हूँ किसी अवतार की तरह

Pujna Chahata Hun Kisi Avtar Ki Tarah

Divik Ramesh
4 min read 12 versesजन-सैलाबpublic protestक्रांति

12 verses · ~4 min

भीड़ भी तो नहीं कह सकता इसे!

माना, न ये लाद कर लाए गए हैं ट्रकों पर और न ही आए हैं ये रेलगाड़ियों पर होकर काबिज। इनके हाथों में ढ़र्रेदार झंडे भी तो नहीं हैं जिन्हें देखने के आदी हैं हम, खासकर जन्तर-मन्तर और इंडिया गेट पर। छुटभैया नेता तक लापता हैं दूर दूर तक कैसी भीड़ है यह जहां भाषण से अधिक लावा उमड़ रहा है हर ओर से! पुलिस का बंदोबस्त ज़रूर वैसा ही है जैसा होता आया है अक्सर।

भर ज़रूर गया है पूरा राजपथ जन सैलाब से तबदील हो गया हो जैसे जनपथ में शायद जन सैलाब ही कहना ठीक रहेगा इसे।

दौड़ो दौड़ो कविताओ, कर लो दर्ज इसे कहीं खिसका न दिया जाए हर क्षण इतिहास रच रहा यह दृश्य।

जितना सोचता हूं उतनी ही पड़ रही हैं माथे पर चिन्ता की रेखाएं उतनी ही अधूरी पड़ रही हैं संज्ञाएं शायद स्वयंभू जन सैलाब कहना उचित हो अधिक।

क्या नहीं लग रहा कि जैसे निकल आई हों हाथों में लिए मशालें जुलूस निकालती तमाम कविताएं 'चांद का मुह टेढ़ा है' की और फैल गई हों सड़क से संसद तक जो धूमिल ही पड़ी थी अब तक।

देखो देखो ठिठुरते कोहरे से कैसे निकल आईं हैं ये पंक्तियां तनी, चमकती-- 'दोस्तो एक बार सिर्फ एक बार शुरुआत जनपथ से भी कर देखो राजपथ खुद सुधर जाएगा।'

सोच रहा हूं संविधान की किस धारा में बांध कर देखूं इसे इस चंगुलों से मुक्त स्वयंभू जन सैलाब को!

कैसा सैलाब है यह जहां मानो दूर दूर तक लग गया हो कर्फ्यू धर्म की दुकानों पर जहां मानो रसातल में भी नहीं जगह पा रही हों राजनीतियां! सिर खुजलाने तक का नहीं अवसर जहां मानो जातियों को राहत में!

कैसा सैलाब है यह जिसकी प्रतीक्षा में जाने कब से खप रही थीं भयभीत, दुबकी बेऔकात कर दी गईं सिसकियों की आंखें लटक आई थीं जो बुझी लालटेनों सी अपने कोटरों पर।

क्या वही तो नहीं है यह जिसकी प्रतीक्षा में सूख कर दरकने लगी थी उम्मीदों की पृथ्वी| क्या वही तो नहीं है यह जिसक प्रतीक्षा में खड़ा होता गया था 'क्या फर्क पड़ता है' जैसे उदास मुहावरों का साम्राज्य! क्या वही तो नहीं है यह जिसकी प्रतीक्षा में कविताएं तक छिपने लगी थीं शंकाओं और प्रश्नों के आवरणों में।

शायद वही है यह लौटने लगी हैं मेरी आस्थाओं की लाशों में सांसें। अगर वही है यह तो मैं पूजना चाहता हूं इसे किसी अवतार की तरह।

इति

Divik Ramesh

The Poet

दिविक रमेश

Divik Ramesh

Shivaji Maharaj at Agra

Paired Painting

Shivaji Maharaj at Agra

The painting captures a soul stirring moment of defiance and contemplation during the historic visit of Chhatrapati Shivaji Maharaj to the Mughal court in Agra. We see the great Maratha warrior reclining with a regal, measured gaze, reflecting the immense psychological weight of his confrontation with the emperor Aurangzeb. His expression is not one of fear, but of profound strategic resolve (he is surrounded by his loyal companions whose vigilant postures suggest they are ever ready to sacrifice their lives for the defense of their leader). This scene is a poignant testament to a legendary encounter where wit and courage challenged the very heart of an empire, forever etching the spirit of Swarajya into the consciousness of the Indian people.

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Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Pujna Chahata Hun Kisi Avtar Ki Tarah carries.