
विडम्बना
Vidambana
Gopal Prasad Vyas
8 verses · ~20 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Raudra
Akash Se Jharta Lava
Divik Ramesh10 verses · ~3 min
राजनीति नहीं छोड़ती अपनी माँ-बहिन को भी जैसे रही है कहावत कि नहीं छोड़ते कई अपने बाप को भी ।
ताज्जुब है नदी की बाढ़ की तरह मान लिया जाता है सब जायज और रह लिया जाता है शान्त । थोड़ा-बहुत हाहाकार भी बह लेता है बाढ़ ही में ।
यह कैसी क़वायद है कि आकाश से झरता रहता है लावा और न फ़र्क पड़ता है उगलती हुई पसीने की आग को और न फ़र्क पड़ता है राजनीति के गलियारों में क़ैद पड़ी ठंडी आहों को ।
यह कैसी स्वीकृति है कि स्वीकृत होने लगती है नपुंसकता एक समय विशेष में खस्सी कर दिए गए एक खास प्रधानमंत्री की । कि स्वीकृत होने लगती हैं सत्ता-विरोधियों की शिखण्डी हरकतें भी ।
मोडे-संन्यासियों के इस देश में दिशाएँ मज़बूर हैं नाचने को वारांगनाओं-सी और धुत्त बस पीट रहे हैं तालियाँ-वाम भी, अवाम भी।
कहावत है हमाम में होते हैं सब नंगे- अपने भी पराए भी ।
अब चरम पर है निरर्थकता समुद्रों की, नदियों की जाने क्यों चाह रहा है मन कि उम्मीद बची रहे बाक़ी पोखरों में, तालाबों में और एकान्त पड़ी नहरों में झरनों में ।
जाने क्यों दिख रही है लौ-सी जलती हिमालय की बर्फ़ों में।
डर है कहीं अध्यात्म तो नहीं हो रहा हूँ मैं!
हो भी जाऊँ अध्यात्म एक बार अगर जाग जाएँ पत्ते वृक्षों के । जाग जाएँ अगर निरपेक्ष पड़ी वनस्पतियाँ । जाग उठे अगर बाँसों में सुप्त नाद । अगर जगा सके भरोसा अस्पताल अपनी राहों में ज़ख़्मी हवाओं का ।
इति

Paired Painting
Shiva Tandava
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