№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Shiva Tandava

Raudra

आकाश से झरता लावा

Akash Se Jharta Lava

Divik Ramesh
3 min read 10 versesराजनीतिpoliticsभ्रष्टाचार

10 verses · ~3 min

राजनीति नहीं छोड़ती अपनी माँ-बहिन को भी जैसे रही है कहावत कि नहीं छोड़ते कई अपने बाप को भी ।

ताज्जुब है नदी की बाढ़ की तरह मान लिया जाता है सब जायज और रह लिया जाता है शान्त । थोड़ा-बहुत हाहाकार भी बह लेता है बाढ़ ही में ।

यह कैसी क़वायद है कि आकाश से झरता रहता है लावा और न फ़र्क पड़ता है उगलती हुई पसीने की आग को और न फ़र्क पड़ता है राजनीति के गलियारों में क़ैद पड़ी ठंडी आहों को ।

यह कैसी स्वीकृति है कि स्वीकृत होने लगती है नपुंसकता एक समय विशेष में खस्सी कर दिए गए एक खास प्रधानमंत्री की । कि स्वीकृत होने लगती हैं सत्ता-विरोधियों की शिखण्डी हरकतें भी ।

मोडे-संन्यासियों के इस देश में दिशाएँ मज़बूर हैं नाचने को वारांगनाओं-सी और धुत्त बस पीट रहे हैं तालियाँ-वाम भी, अवाम भी।

कहावत है हमाम में होते हैं सब नंगे- अपने भी पराए भी ।

अब चरम पर है निरर्थकता समुद्रों की, नदियों की जाने क्यों चाह रहा है मन कि उम्मीद बची रहे बाक़ी पोखरों में, तालाबों में और एकान्त पड़ी नहरों में झरनों में ।

जाने क्यों दिख रही है लौ-सी जलती हिमालय की बर्फ़ों में।

डर है कहीं अध्यात्म तो नहीं हो रहा हूँ मैं!

हो भी जाऊँ अध्यात्म एक बार अगर जाग जाएँ पत्ते वृक्षों के । जाग जाएँ अगर निरपेक्ष पड़ी वनस्पतियाँ । जाग उठे अगर बाँसों में सुप्त नाद । अगर जगा सके भरोसा अस्पताल अपनी राहों में ज़ख़्मी हवाओं का ।

इति

Divik Ramesh

The Poet

दिविक रमेश

Divik Ramesh

Shiva Tandava

Paired Painting

Shiva Tandava

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Akash Se Jharta Lava carries.