
विडम्बना
Vidambana
Gopal Prasad Vyas
8 verses · ~20 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

4 verses · ~1 min
प्यादे से वज़ीर बनते हैं ऐसी बिछी बिसात नए भोर का भ्रम देती है निखर गई है रात
कई एक चेहरे, चेहरों के त्रास और सन्त्रास भीतर तक भय से भर देते हास और परिहास नहीं बचा `साबुत' क़द कोई ऐसा उपल निपात
बन्द गली के सन्नाटों में कोई दस्तक जैसी भर देती हैं खालीपन से बातें कैसी-कैसी नई-नई अनुगूँजें बनते नए-नए अनुपात
लोककथाएँ जिनमें पीड़ा का अनन्त विस्तार हम ऐसे अभ्यस्त कि खलता कोई भी निस्तार बातों से बातें उठती हैं सब भूले औकात ।
इति

Paired Painting
The Game of Dice
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Pyade Se Wazira carries.