
मैं आँखें मूँदें सुनूँ और तुम गाओ
Main Aankhen Moonde Sunoon Aur Tum Gao
Amitabh Tripathi ‘Amit’
7 verses · ~15 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

4 verses · ~2 min
अपने हलके-फुलके उड़ते स्पर्शों से मुझको छू जाती है जार्जेट के पीले पल्ले-सी यह दोपहर नवम्बर की!
आयी गयी ऋतुएँ पर वर्षों से ऐसी दोपहर नहीं आयी जो क्वाँरेपन के कच्चे छल्ले-सी इस मन की उँगली पर कस जाये और फिर कसी ही रहे नित प्रति बसी ही रहे, आँखों, बातों में, गीतों में आलिंगन में घायल फूलों की माला-सी वक्षों के बीच कसमसी ही रहे
भीगे केशों में उलझे होंगे थके पंख सोने के हंसों-सी धूप यह नवम्बर की उस आँगन में भी उतरी होगी सीपी के ढालों पर केसर की लहरों-सी गोरे कंधों पर फिसली होगी बन आहट गदराहट बन-बन ढली होगी अंगों में
आज इस वेला में दर्द में मुझको और दोपहर ने तुमको तनिक और भी पका दिया शायद यही तिल-तिल कर पकना रह जायेगा साँझ हुए हंसों-सी दोपहर पाँखें फैला नीले कोहरे की झीलों में उड़ जायेगी यह है अनजान दूर गाँवों से आयी हुई रेल के किनारे की पगडण्डी कुछ क्षण संग दौड़-दौड़ अकस्मात् नीले खेतों में मुड़ जायेगी...
इति

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Indian Beauty
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what November Ki Dopahar carries.