
झाँकते हैं फिर नदी में पेड़
Jhankte Hain Phir Nadi Mein Ped
Dhananjay Singh
5 verses · ~7 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Shanta
Subah-Subah Suraj Ne Puchha
Dhananjay Singh7 verses · ~2 min
सुबह-सुबह सूरज ने पूछा कहाँ बिताई रात कहो
कोई रचना आ चुपके से कानों में बतियाई या कि नए भावों की कोई आहट पड़ी सुनाई क्या कोई ऐसा विचार था जिसने नींद उडाई या फिर परी-लोक की छवि सपनों में रही समाई
या कि राह में अड़ा रहा मन का कोई आघात कहो.
कोई गीत नहीं रच पाए क्या करते रहते हो जगत-दिखावे को ही क्या कागज़ काले करते हो क्या मंचों पर ताली बजवाना है चाह तुम्हारी सच-सच बोलो क्या है रचनाओं की राह तुम्हारी
क्यों मन करता तुम पर ऐसे प्रश्नों की बरसात कहो.
उतर कहीं से आया कोई मन में धीरे-धीरे या कि कहीं मिल गए भाव के उज्ज्वल मोती-हीरे नूतन बिम्ब उभर कर कोई शब्दों में आया है या फिर कोई गीत जन्म लेने को अकुलाया है
यदि ऐसा है तो फिर उसको हँस कर 'शुभ सुप्रभात' कहो!
इति

Paired Painting
Kunti and Surya
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Subah-Subah Suraj Ne Puchha carries.