
3 verses · ~2 min
हो दोस्त या कि वह दुश्मन हो, हो परिचित या परिचय विहीन; तुम जिसे समझते रहे बड़ा या जिसे मानते रहे दीन; यदि कभी किसी कारण से उसके यश पर उड़ती दिखे धूल, तो सख़्त बात कह उठने की रे, तेरे हाथों हो न भूल । मत कहो कि वह ऐसा ही था, मत कहो कि इसके सौ गवाह; यदि सचमुच ही वह फिसल गया या पकड़ी उसने ग़लत राह -- तो सख़्त बात से नहीं, स्नेह से काम ज़रा लेकर देखो; अपने अन्तर का नेह अरे, देकर देखो ।
कितने भी गहरे रहें गर्त, हर जगह प्यार जा सकता है; कितना भी भ्रष्ट ज़माना हो, हर समय प्यार भा सकता है; जो गिरे हुए को उठा सके इससे प्यारा कुछ जतन नहीं, दे प्यार उठा पाए न जिसे इतना गहरा कुछ पतन नहीं । देखे से प्यार भरी आँखें दुस्साहस पीले होते हैं हर एक धृष्टता के कपोल आँसू से गीले होते हैं । तो सख़्त बात से नहीं स्नेह से काम ज़रा लेकर देखो, अपने अन्तर का नेह अरे, देकर देखो ।
तुमको शपथों से बड़ा प्यार, तुमको शपथों की आदत है; है शपथ ग़लत, है शपथ कठिन, हर शपथ कि लगभग आफ़त है; ली शपथ किसी ने और किसी के आफ़त पास सरक आई, तुमको शपथों से प्यार मगर तुम पर शपथें छाईं-छाईं । तो तुम पर शपथ चढ़ाता हूँ: तुम इसे उतारो स्नेह-स्नेह, मैं तुम पर इसको मढ़ता हूँ तुम इसे बिखेरो गेह-गेह । हैं शपथ तुम्हारे करुणाकर की है शपथ तुम्हें उस नंगे की जो भीख स्नेह की माँग-माँग मर गया कि उस भिखमंगे की । हे, सख़्त बात से नहीं स्नेह से काम जरा लेकर देखो, अपने अन्तर का नेह अरे, देकर देखो ।
इति

Paired Painting
Shivaji and Subedar's Daughter
This profound work depicts one of the most celebrated moral episodes in Maratha history, illustrating the legendary chivalry of Chhatrapati Shivaji Maharaj. Following a successful campaign, the daughter of the defeated Subedar of Kalyan was brought before Shivaji. Instead of treating her as a prisoner, the great king greeted her with the respect due to a daughter, famously remarking that he wished his own mother had been as beautiful so that he himself might have been born more handsome. In this poignant scene, the artist captures the moment of supreme grace, where the king acknowledges the dignity of his guest while the Subedar stands in humble reverence. It serves as a timeless testament to the king's commitment to righteousness, or Dharma, during the volatility of war.
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