
वे आँखें
Ve Aankhen
Sumitranandan Pant
9 verses · ~40 lines · 2 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

3 verses · ~5 min
चरमर- चरमर- चूँ- चरर- मरर जा रही चली भैंसागाड़ी! गति के पागलपन से प्रेरित चलती रहती संसृति महान; सागर पर चलते हैं जहाज , अंबर पर चलते वायुयान . भूतल के कोने-कोने में रेलों-ट्रामों का जाल बिछा , हैं दौड़ रही मोटर-बसें लेकर मानव का वृहत ज्ञान! पर इस प्रदेश में जहाँ नहीं उच्छ्वास,भावनाएँ चाहे , वे भूखे अधखाये किसान, भर रहे जहाँ सूनी आहें . नंगे बच्चे, चिथरे पहने, माताएँ जर्जर डोल रही , है जहाँ विवशता नृत्य कर रही,धूल उड़ाती हैं राहें! बीते युग की परछाहीं सी,बीते युग का इतिहास लिये, 'कल'के उन तंद्रिल सपनों में 'अब'का निर्दय उपहास लिये, गति में किन सदियों की जड़ता,मन में किस स्थिरता की ममता अपनी जर्जर सी छाती में, अपना जर्जर विश्वास लिये! भर-भरकर फिर मिटने का स्वर,कँप-कँप उठते जिसके स्तर-स्तर हिलती-डुलती,हँफती-कंपती,कुछ रुक-रुककर,कुछ सिहर-सिहर , चरमर- चरमर- चूँ- चरर- मरर जा रही चली भैंसागाड़ी!
उस ओर क्षितिज के कुछ आगे, कुल पाँच कोस की दूरी पर, भू की छाती पर फोड़ों-से हैं, उठे हुए कुछ कच्चे घर! मैं कहता हूँ खंडहर उसको, पर वे कहते हैं उसे ग्राम , पशु बनकर नर पिस रहे जहाँ, नारियाँ जन रहीं हैं गुलाम , पैदा होना फिर मर जाना,बस यह लोगों का एक काम! था वहीं कटा दो दिन पहले गेंहूँ का छोटा एक खेत! तुम सुख-सुषमा के लाल, तुम्हारा है विशाल वैभव-विवेक, तुमने देखी है मान-भरी उच्छृंखल सुन्दरियाँ अनेक , तुम भरे-पुरे,तुम हृष्ट-पुष्ट ,ओ तुम समर्थ कर्ता-हर्ता, तुमने देखा है क्या बोलो ,हिलता-डुलता कंकाल एक? वह था उसका ही खेत,जिसे उसने उन पिछले चार माह, अपने शोणित को सुखा-सुखा,भर-भरकर अपनी विवश आह, तैयार किया था और घर में थी रही रुग्ण पत्नी कराह! उसके वे बच्चे तीन, जिन्हें माँ-बाप का मिला प्यार न था, थे क्षुधाग्रस्त बिलबिला रहे मानों वे मोरी के कीड़े , वे निपट घिनौने, महापतित, बौने, कुरूप टेढ़े-मेढे! उसका कुटुंब था भरा-पुरा आहों से, हाहाकारों से , फाको से लड़-लड़कर प्रतिदिन घुट-घुटकर अत्याचारों से . तैयार किया था उसने ही अपना छोटा-सा एक खेत! बीबी बच्चों से छीन, बीन दाना-दाना, अपने में भर, भूखे तड़पें या मरें, भरों का तो भरना है उसको घर , धन की दानवता से पीड़ित कुछ फटा हुआ,कुछ कर्कश स्वर , चरमर- चरमर- चूँ- चरर- मरर जा रही चली भैंसागाड़ी!
है बीस कोस पर एक नगर,उस एक नगर में एक हाट, जिसमें मानव की दानवता फैलाये है निज राज-पाट; साहूकारों का भेष धरे है जहाँ चोर औ' गिरहकाट, है अभिशापों से घिरा जहाँ पशुता का कलुषित ठाट-बाट. चांदी के टुकड़ों को लेने,प्रतिदिन पिसकर,भूखों मरकर , भैंसागाड़ी पर लदा हुआ, जा रहा चला मानव जर्जर, है उसे चुकाना सूद,कर्ज है उसे चुकाना अपना कर, जितना खाली है उसका घर उतना खाली उसका अंतर . औ' कठिन भूख की जलन लिये नर बैठा है बनकर पत्थर, पीछे है पशुता का खंडहर , दानवता का सामने नगर , चरमर- चरमर- चूँ- चरर- मरर जा रही चली भैंसागाड़ी!
इति

Paired Painting
Krishna and Arjuna on the Chariot
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Bhaisagadi carries.