
मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा
Man Mausam Ka Kaha Chhai Ghata Jam Utha
Bashir Badr
5 verses · ~9 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

6 verses · ~1 min
वो महकती पलकों की ओट से कोई तारा चमका था रात में मेरी बंद मुठ्ठी ना खोलिये वही कोहीनूर था हाथ में
मैं तमाम तारे उठा-उठा कर ग़रीबों में बाँट दूँ कभी एक रात वो आसमाँ का निज़ाम[1] दे मेरे हाथ में
अभी शाम तक मेरे बाग़ में कहीं कोई फूल खिला न था मुझे खुशबुओं में बसा गया तेरा प्यार एक ही रात में
तेरे साथ इतने बहुत से दिन तो पलक झपकते गुज़र गये हुई शाम खेल ही खेल में गई रात बात ही बात में
कभी सात रंगों का फूल हूँ, कभी धूप हूँ, कभी धूल हूँ मैं तमाम कपडे बदल चुका तेरे मौसमों की बरात में
शब्दार्थ:
इति

Paired Painting
Damayanti choosing her husband in her Svayamvara
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Wo Mahakati Palkon Ki Ot carries.