
दिल्लियाँ
Dilliyan
Shalabh Shriram Singh
5 verses · ~12 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

1 verses · ~2 min
सभागार की ये पुरानी दरी गालिब के किसी शेर के साथ बुनी गई होगी - कम से कम दो शताब्दी पहले। ’दर‘ का ’दर्द‘ से होगा जरूर कोई तो रिश्ता ’दायम पडा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं - कह नहीं सकती बेचारी दरी। जूते-चप्पल झेलकर भी हरदम सजदे में बिछी धूल फाँकती सदियों की मसक गई है ये जरा-सी जब कभी खिंच जाती है सभा लम्बी राकस की टीक की तरह धीरे से भरती है शिष्ट दरी नन्हीं-मुन्नी एक अचकचाती-सी उबासी पुराने अदब का इतना लिहाज है उसे, खाँसती भी है तो धीरे से! किरकिराती जीभ से रखती है होंठ ये लगातार तर किसी पुराने चश्मे के काँच-सी-धुँधली, किसी गंदुमी शाम-सी धूसर सभागार की ये पुरानी दरी बुनी गई होगी गालिब के किसी शेर की तरह कम-से-कम दो शताब्दी पहले। नई-नई माँओं को जब पढने होते हैं सेमिनार में पर्चे पीली सी साटन की फालिया पर छोड जाती हैं वे बच्चे सभागार की इस दरी दादी के भरोसे।
इति

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Dayam Tere Dar Pe carries.