№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

Canvas
Draupadi Humiliated

Karuna

तुमने केवल बाहर देखा

Tumne Keval Bahar Dekha

Pratibha Saxena
5 min read 9 versesसहानुभूतिempathyगरीबी

9 verses · ~5 min

तुमने केवल बाहर देखा, काश हृदय में झाँका होता!

तुमने देखा मस्त हिलोंरों भरा सिन्धु का उमडा यौवन, कुमने देखा हिम किरीट से ढँकीहुई पर्वत की चोटी, पर बहार से भरे दिनों में बौरी आकुल अमराई से, तेरे अंतर से कोकिल की कूक कभी टकराई होती, तब अव्यक्त उस मधुता का तीखापन तुम अनुभव कर पाते, चाहे गहराई से तुमने उसा मोल न आँका होता!

जलते देखे दीप हजारों, जिनसे कुहू बले उजियाली, देखी होगी ऊँचे-ऊँचे महलों में मनती दीवाली, झोपडियों की अँधियारी में शायद देक नहीं पाते हो गहन अमाँ का कफन ओढ कर पडी जहाँ जीवन की लाली! तुमने गिरती मानवता का देखा होता काश तमाशा, जिसकी साँसों का चलना भी किसी नयन का काँटा होता!

इतिहासों के पृष्ठ पलट कर, देखा सम्राटों का वैभव, आँख मूँद कर हार जीत की बोली सुन ली होगी तुमने, पर देखो जन-जीवन को क्या आँख खोल कर देख सकोगे, कैसे अब इन्सान चल रहा अपने वर्तमान के पथ में! अपनी न्याय तुला पर बीती सदियों को तो तोल चुके तुम, काश एक ही बार स्वयं के युग को भी कुछ जाँचा होता!

दुनिया की सडकों पर चलते तुमको शायद ये न पता हो, नैनों की गंगा -यमुना के तट पर कितने ताज अधूरे, काश, जानते, यहाँ मनुज का खून-पसीना भी बिक जाता, टुकडों की छीना-झपटी में, जीने को भी दाम न पूरे! काश जानते आज यहाँ, मानवता बिकती, लुटती, पिटती चाहे उसकी लूटमार तुमको भी एक तमाशा होता! ,

तुमने देखा मस्त हिलोंरों भरा सिन्धु का उमडा यौवन, कुमने देखा हिम किरीट से ढँकीहुई पर्वत की चोटी, पर बहार से भरे दिनों में बौरी आकुल अमराई से, तेरे अंतर से कोकिल की कूक कभी टकराई होती, तब अव्यक्त उस मधुता का तीखापन तुम अनुभव कर पाते, चाहे गहराई से तुमने उसा मोल न आँका होता!

जलते देखे दीप हजारों, जिनसे कुहू बने उजियाली, देखी होगी ऊँचे-ऊँचे महलों में मनती दीवाली, झोपडियों की अँधियारी में शायद देक नहीं पाते हो गहन अमाँ का कफन ओढ कर पडी जहाँ जीवन की लाली! तुमने गिरती मानवता का देखा होता काश तमाशा, जिसकी साँसों का चलना भी किसी नयन का काँटा होता!

इतिहासों के पृष्ठ पलट कर, देखा सम्राटों का वैभव, आँख मूँद कर हार जीत की बोली सुन ली होगी तुमने, पर देखो जन-जीवन को क्या आँख खोल कर देख सकोगे, कैसे अब इन्सान चल रहा अपने वर्तमान के पथ में! अपनी न्याय तुला पर बीती सदियों को तो तोल चुके तुम, काश एक ही बार स्वयं के युग को भी कुछ जाँचा होता!

दुनिया की सडकों पर चलते तुमको शायद ये न पता हो, नैनों की गंगा -यमुना के तट पर कितने ताज अधूरे, काश, जानते, यहाँ मनुज का खून-पसीना भी बिक जाता, टुकडों की छीना-झपटी में, जीने को भी दाम न पूरे! काश जानते आज यहाँ, मानवता बिकती, लुटती, पिटती चाहे उसकी लूटमार तुमको भी एक तमाशा होता! तुमने केवल बाहर देखा, काश हृदय में झाँका होता!

इति

Pratibha Saxena

The Poet

प्रतिभा सक्सेना

Pratibha Saxena

Draupadi Humiliated

Paired Painting

Draupadi Humiliated

This profound and emotionally charged canvas captures a devastating moment from the Virata Parva of the Mahabharata. Disguised as Sairandhri, the queen Draupadi lies fallen and weeping on the opulent palace floor, having been brutally assaulted by the commander Kichaka for refusing his advances. Raja Ravi Varma masterfully orchestrates the tension in the royal court, contrasting the utter vulnerability and grief of Draupadi with the arrogant stance of Kichaka and the helpless dismay of King Virata seated upon his throne. Through rich theatrical lighting and profound psychological realism, Varma honors the eternal dignity of Draupadi while exposing the profound moral failing of the court around her, inviting the viewer into a timeless meditation on honor, suffering, and divine justice.

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If this held you

Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Tumne Keval Bahar Dekha carries.