
अमर राष्ट्र
Amar Rashtra
Makhanlal Chaturvedi
18 verses · ~45 lines · 2 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
Loading the archive
MM · XXVI

10 verses · ~4 min
आज राष्ट्र का मुक्ति-पर्व है जागो कवि की वाणी; फूंको शंख विजय का, जय हो भारत-भूमि भवानी ! फूलो फूल, लताओ झूमो, अम्बर बरसो पानी; मन-मयूर नाचो रे आई प्रिय स्वतन्त्रता रानी !!
वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर जूझी लक्ष्मी रानी; वीर पेशवा नाना ने कर दिया खून का पानी। तांत्या टोपे ने जिसकी असली कीमत पहिचानी; लड़ा गया संग्राम गदर का जिसकी अमर कहानी ॥
वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर बिस्मिल थे शैदाई; जूझ गए आज़ाद पार्क में डटकर लड़ी लड़ाई। फाके किए यतीन्द्रनाथ ने, मारे गए कन्हाई; भगतसिंह ने हंसते-हंसते खुलकर फांसी खाई॥
वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर बापू जग में आए; मुक्ति-युद्ध के लिए जिन्होंने नये शास्त्र अपनाए। राष्ट्रपिता के इंगित पर दी भारत ने कुर्बानी; साठ वर्ष तक लड़े सिपाही दिन और रात न जानी॥
वह स्वतन्त्रता जो कि हमें प्राणों से भी प्यारी थी; वह स्वतन्त्रता जिसके हित डांडी की तैयारी थी। वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर असहयोग अपनाया; मिट्टी में मिल गए किन्तु झण्डे को नहीं झुकाया॥
बयालीस के वीर बागियो, जान खपाने वालो; 'करो-मरो' के महायज्ञ में गोली खाने वालो ! जेल-यातना सहने वालो सत्त्व गंवाने वालो; विजय तुम्हारे घर आई है आओ इसे सम्हालो॥
उन्हें राष्ट्र का नमस्कार जो काम देश के आए; सेवक बनकर रहे चने तसलों में रखकर खाए। भारत उनका ऋणी जिन्होंने हंसकर कष्ट उठाए; सदा कर्मरत रहे नाम अखबारों में न छपाए॥ नेताजी तुम कहां छिपे हो ? याद तुम्हारी आती; भारत के बच्चे-बच्चे की भर-भर आती छाती। 'दिल्ली चलो' तुम्हारा नारा देखो पूर्ण हुआ है; परदेशी का भाग्य-सितारा पिसकर चूर्ण हुआ है॥ उठो बहादुरशाह कब्र से किला लौट आया है; हटा यूनियन जैक, तिरंगा उस पर लहराया है। औंधे तम्बू अंग्रेजों के, पड़ी बैरकें खाली; तेरी दिल्ली आज मनाती घर-घर खुशी दिवाली॥
सुनो तिलक महाराज ! स्वर्ग में भारत के जयकारे; तुम्हें जेल में रखनेवाले खुद लग गए किनारे। जन्मसिद्ध अधिकार हमारा हमने छीन लिया है; ब्रिटिश सल्तनत के तख्ते को तेरह-तीन किया है॥
सदियों पीछे आज जमाना ऐसा शुभ आया है; जब अशोक का चक्र पुनः भारत में फहराया है; जबकि हिमालय का सिर ऊंचा गंगा गौरव गाती; जब भारत की जनता जय नेहरू, पटेल की गाती ॥
मुक्त पवन में सांस ले रहे हैं अब भारतवासी; पूरब में प्रकाश फैला है स्वर्णिम उषा प्रकाशी। भारतवर्ष स्वतन्त्र हुआ है गाओ नया तराना; नया एशिया जागा है अब बदला नया ज़माना॥
इति

Paired Painting
Raja Balwant Singh with Colonel Borthwick
This magnificent folio captures a profound moment of cross-cultural encounter during the nineteenth century, immortalizing Raja Balwant Singh alongside Colonel Borthwick in a grand procession. Painted by the master artist Baijnath, the work reflects the shifting political landscapes of the Pahari region, where traditional Rajput courtly splendor converged with British colonial presence. Through meticulous detail, vibrant mineral pigments, and delicate gold accents, the artist preserves not merely a historical meeting, but a vivid theatrical tableau of diplomacy, power, and pageantry set against the warm terracotta walls of the palace.
Open the viewer →
If this held you
Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Mukti Parv carries.