
चांदनी
Chandni
Sumitranandan Pant
2 verses · ~39 lines · 2 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

6 verses · ~4 min
शांत स्निग्ध, ज्योत्स्ना उज्ज्वल! अपलक अनंत, नीरव भू-तल! सैकत-शय्या पर दुग्ध-धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म-विरल, लेटी हैं श्रान्त, क्लान्त, निश्चल! तापस-बाला गंगा, निर्मल, शशि-मुख से दीपित मृदु-करतल, लहरे उर पर कोमल कुंतल। गोरे अंगों पर सिहर-सिहर, लहराता तार-तरल सुन्दर चंचल अंचल-सा नीलांबर! साड़ी की सिकुड़न-सी जिस पर, शशि की रेशमी-विभा से भर, सिमटी हैं वर्तुल, मृदुल लहर।
चाँदनी रात का प्रथम प्रहर, हम चले नाव लेकर सत्वर। सिकता की सस्मित-सीपी पर, मोती की ज्योत्स्ना रही विचर, लो, पालें चढ़ीं, उठा लंगर। मृदु मंद-मंद, मंथर-मंथर, लघु तरणि, हंसिनी-सी सुन्दर तिर रही, खोल पालों के पर। निश्चल-जल के शुचि-दर्पण पर, बिम्बित हो रजत-पुलिन निर्भर दुहरे ऊँचे लगते क्षण भर। कालाकाँकर का राज-भवन, सोया जल में निश्चिंत, प्रमन, पलकों में वैभव-स्वप्न सघन।
नौका से उठतीं जल-हिलोर, हिल पड़ते नभ के ओर-छोर। विस्फारित नयनों से निश्चल, कुछ खोज रहे चल तारक दल ज्योतित कर नभ का अंतस्तल, जिनके लघु दीपों को चंचल, अंचल की ओट किये अविरल फिरतीं लहरें लुक-छिप पल-पल। सामने शुक्र की छवि झलमल, पैरती परी-सी जल में कल, रुपहरे कचों में ही ओझल। लहरों के घूँघट से झुक-झुक, दशमी का शशि निज तिर्यक्-मुख दिखलाता, मुग्धा-सा रुक-रुक।
अब पहुँची चपला बीच धार, छिप गया चाँदनी का कगार। दो बाहों-से दूरस्थ-तीर, धारा का कृश कोमल शरीर आलिंगन करने को अधीर। अति दूर, क्षितिज पर विटप-माल, लगती भ्रू-रेखा-सी अराल, अपलक-नभ नील-नयन विशाल; मा के उर पर शिशु-सा, समीप, सोया धारा में एक द्वीप, ऊर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप; वह कौन विहग? क्या विकल कोक, उड़ता, हरने का निज विरह-शोक? छाया की कोकी को विलोक?
पतवार घुमा, अब प्रतनु-भार, नौका घूमी विपरीत-धार। ड़ाँड़ों के चल करतल पसार, भर-भर मुक्ताफल फेन-स्फार, बिखराती जल में तार-हार। चाँदी के साँपों-सी रलमल, नाँचतीं रश्मियाँ जल में चल रेखाओं-सी खिंच तरल-सरल। लहरों की लतिकाओं में खिल, सौ-सौ शशि, सौ-सौ उडु झिलमिल फैले फूले जल में फेनिल। अब उथला सरिता का प्रवाह, लग्गी से ले-ले सहज थाह हम बढ़े घाट को सहोत्साह।
ज्यों-ज्यों लगती है नाव पार उर में आलोकित शत विचार। इस धारा-सा ही जग का क्रम, शाश्वत इस जीवन का उद्गम, शाश्वत है गति, शाश्वत संगम। शाश्वत नभ का नीला-विकास, शाश्वत शशि का यह रजत-हास, शाश्वत लघु-लहरों का विलास। हे जग-जीवन के कर्णधार! चिर जन्म-मरण के आर-पार, शाश्वत जीवन-नौका-विहार। मै भूल गया अस्तित्व-ज्ञान, जीवन का यह शाश्वत प्रमाण करता मुझको अमरत्व-दान।
इति

Paired Painting
Saraswati in Concert
This serene scene depicts Saraswati, the Hindu goddess of wisdom, music, and the arts, gracefully traveling across calm waters. She is shown playing her signature veena, her presence imbuing the landscape with divine tranquility. The artist skillfully blends the rigorous techniques of European realism with the profound spiritual aesthetics of India, creating a bridge between two worlds. The swan, her sacred vehicle, glides nearby, and a companion sits respectfully before her, highlighting the intimate and meditative nature of the encounter. This artwork served as a powerful cultural vessel, allowing millions to venerate the goddess in their own domestic spaces, thereby fostering a deep, personal connection to heritage that persists to this day.
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