№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Princess Giving Golden Earring to Brahman Boy

Shanta

आ: धरती कितना देती है

Aa: Dharti Kitna Deti Hai

Sumitranandan Pant
5 min read 10 versesधरतीearthबीज

10 verses · ~5 min

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे , रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी , और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा! पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा , बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला । सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये ।

मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक , बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर । मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे , ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था ।

अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे । कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने ग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाई सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन ।

औ' जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लिये गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे । भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों ।

मै फिर भूल गया था छोटी से घटना को और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन । किन्तु एक दिन , जब मै सन्ध्या को आँगन मे टहल रहा था- तब सह्सा मैने जो देखा , उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से ।

देखा आँगन के कोने मे कई नवागत छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए है । छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की; या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं ,प्यारी - जो भी हो , वे हरे हरे उल्लास से भरे पंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थे डिम्ब तोडकर निकले चिडियों के बच्चे से ।

निर्निमेष , क्षण भर मै उनको रहा देखता- सहसा मुझे स्मरण हो आया कुछ दिन पहले , बीज सेम के रोपे थे मैने आँगन मे और उन्ही से बौने पौधौं की यह पलटन मेरी आँखो के सम्मुख अब खडी गर्व से , नन्हे नाटे पैर पटक , बढ़ती जाती है ।

तबसे उनको रहा देखता धीरे धीरे अनगिनती पत्तो से लद भर गयी झाडियाँ हरे भरे टँग गये कई मखमली चन्दोवे बेलें फैल गई बल खा , आँगन मे लहरा और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का हरे हरे सौ झरने फूट ऊपर को मै अवाक रह गया वंश कैसे बढता है

यह धरती कितना देती है । धरती माता कितना देती है अपने प्यारे पुत्रो को नहीं समझ पाया था मै उसके महत्व को बचपन मे , छि: स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर

रत्न प्रसविनि है वसुधा , अब समझ सका हूँ । इसमे सच्ची समता के दाने बोने है इसमे जन की क्षमता के दाने बोने है इसमे मानव ममता के दाने बोने है जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसले मानवता की - जीवन क्ष्रम से हँसे दिशाएं हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे ।

इति

Sumitranandan Pant

The Poet

सुमित्रानंदन पंत

Sumitranandan Pant

Princess Giving Golden Earring to Brahman Boy

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Princess Giving Golden Earring to Brahman Boy

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