№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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The Universal Form of Krishna

Shanta

नव इंद्रिय

Nav Indriy

Sumitranandan Pant
1 min read 4 versesचेतनाconsciousnessमानवता

4 verses · ~1 min

नव जीवन को इंद्रिय दो हे, मानव को, नव जीवन की नव इंद्रिय, नव मानवता का अनुभव कर सके मनुज नव चेतनता से सक्रिय!

स्वर्ग खंड इस पुण्य भूमि पर प्रेत युगों से करते तांडव, भव मानव का मिलन तीर्थ बन रहा रक्त चंडी का रौरव! अनिर्वाप्य साम्राज्य लालसा अगणित नर आहुति देती नव, जाति वर्ग औ’ देश राष्ट्र में आज छिड़ा प्रलयंकर विप्लव!

नव युग की नव आत्मा दो पशु मानव को, नव जीवन की नव इंद्रिय, भव मानवता का साम्राज्य बने भू पर दश दिशि के जनगण को प्रिय।

रचनाकाल: सितंबर’ ३९

इति

Sumitranandan Pant

The Poet

सुमित्रानंदन पंत

Sumitranandan Pant

The Universal Form of Krishna

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The Universal Form of Krishna

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Nav Indriy carries.